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नाटक चालू आहे

                          - आलोक वर्मा

चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों के लिए विधानसभा चुनावों की तिथि घोषित कर दिए जाने के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी में पारिवारिक कलह रूपी नौटंकी लगातार जारी है। मीडिया को यादव परिवार की नौटंकी रोजाना कुछ न कुछ मसाला दे जाती रही है। लेकिन इसी बीच पंजाब में  च‌ुनाव प्रचार जोर पकड़ गया। पहले मंगलवार को दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के चुनावी भाषण पर तहलका मचा। मीडिया ने संसेशनल न्यूज के चक्कर में मनीष के बयान में थोड़ा से हेरफेर किया तो वह खबर हेडिंग बन गई। हुआ यूं कि सिसोदिया ने मोहाली की एक चुनावी सभा में कहा कि आप लोग यह मानकर आप को वोट  दीजिए कि केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं। वह आपके सारे काम करवाएंगे। लेकिन पत्रकारों ने सिसोदिया के बयान का दूसरा हिस्सा उड़ा दिया और यह चला दिया कि पंजाब के सीएम केजरीवाल होंगे।
फिर क्या था, दनादन सभी दलों के नेताओं के बयान आने शुरू हो गए। अपने अपने तरीके से उसकी व्याख्या होने लगी। अकाली दल ने तो यहां तक कह दिया कि  किसी गैर पंजाबी को सीएम नहीं बनने दिया जाएगा। किसी हरियाणवी को तो किसी भी हालत में नहीं। इस बारे में आप की सफाई को कोई सुनने के लिए तैयार नहीं हुआ। बुधवार को केजरीवाल के यह कहने के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री रहेंगे पंजाब के नहीं बनेंगे।
यह विवाद अभी चल ही रहा था कि पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के ऊपर एक व्यक्ति ने जूता फेंक दिया। इधर कई सालों में जूता फेंकना एक कला के रूप में उभरा है। पेशे से पत्रकार रहे आप के दिल्ली से‌ विधायक और लंबी से प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ चुनाव में उतरने वाले जरनैल सिंह ने तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंका था। उनका दिखाया रास्ता लोगों को बड़ा पसंद आया और अब आए दिन किसी न किसी राजनीतिज्ञ पर जूता फेंक कर अपना गुस्ता जता देता है। निम्न स्तरीय इस कार्य को करके लोग खुश होते हैं और उनका नाम एकाध दिन तक न्यूज में रहता है। गुस्सा जताने का यह कौन सा तरीका है इसे अब तक कोई साफ नहीं कर पाया है। प्रकाश सिंह बादल पर जूता फेकने वाले ने उनके प्रति नाराजगी का पीछे भी बहुत अजीब सा तर्क दिया है। उसका कहना है कि बादल पिछले एक साल से बादल द्वारा ग्रंथ बेअदबी से नाराज था। अब इस घटना को लेकर भी आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। अकाली दल ने इसे आप की साजिश बताया है। अगले दिनों में यह मामला और जोर पकड़ेगा। पंजाब का चुनाव रोचक होगा और हर दिन नए नए नजारे सामने आएंगे।
लेकिन सबसे बड़ी चिंता इस बात की होनी चाहिए कि जूता फेंककर गुस्सा जताने का तरीका क्या सही है। आज बुजुर्ग प्रकाश सिंह बादल पर यह हुआ है कल किसी और पर हो सकता है। लेकिन दुखद यह है कि जब विपक्षी नेता पर इस तरह का हमला होता है तो गंभीरता से कोई इसकी आलोचना नहीं करता और उनके प्रशंसक/ अनुयायी खुश होते हैं। पिछले दिनों यही हुआ था जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर हरियाणा के रोहतक में एक व्यक्ति ने जूता फेंक दिया था। स्याही से लेकर जूता फेंकने की यह परंपरा आदिम कबीले जैसी है। दुनिया बहुत आगे निकल गई है लेकिन यह कृत्य करने वाले समय के साथ कदमताल नहीं कर पा रहे। लेकिन इस तरफ सभी राजनीतिक दलों को ध्यान देना चाहिए।

टिप्पणियाँ

  1. जूता की प्राचीन परम्‍परा नये दौर में भी कितनी मौजू है, भविष्‍य स्‍वर्णिम है

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  2. Well written article bhai .congratulation.keep it up.

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  3. उत्साह बनाए र‌ख‌िए। तभी आगे कुछ हो पाएगा।

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  4. जरूर भाई। आप लिखना जारी रखें हम उत्साह बढ़ाते रहेंगे।
    अखिलेश

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