सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं
ओम पुरी को अंतिम सलाम
+
                                                                                                           - आलोक वर्मा                                 
 ओम पुरी नहीं रहे। सुबह सुबह टीवी पर जब यह खबर सुनी तो लगा जैसे कोई अपना बिछुड़ गया हो। ओम पुरी मेरे पसंदीदा एक्टरों में से एक हैं या यू कहें कि सबसे पसंदीदा एक्टर रहे हैं। जिनकी फिल्मों क ो देखकर फिल्मों के प्रति जो थोड़ी बहुत समझ बनी उनमें ओम पुरी की ‌‌फिल्में ‌शामिल थीं। मेरी उनसे एक छोटी सी मुलाकात हुुई थी। भीष्म साहनी के उपन्यास तमस पर गोबिंद निहलानी ने उसी नाम (तमस- 1988) में फिल्म बनाई। इस फिल्म से जुड़े सभी लोगों को पश्चिम बंगाल सरकार ने स?मानित किया था। उसी समारोह में कलकत्ता (अब कोलकाता) में मेरी भी ओम पुरी और भीष्म साहनी से छोटी सी मुलाकात हुई थी। ओम पुरी ने जो अपनापन दिखाते हुए मुझसे बातचीत की तो ऐसा लगा ही नहीं कि मैं किसी बड़े कलाकार से बात कर रहा हूं। उन्होंने पढ़ाई से लेकर सिनेमा तक की रुचि के बारे में पूछा था। उनकी यह कहा आज भी जेहन में है कि जो फिल्म जीवन को कोई दृष्टिकोण प्रदान करे वास्तव में वही अच्छी फिल्म होती है। मैंने फिल्मों से जुड़े उनसे कई सवाल किए और उन्होंने हंसते हुए हर सवाल का जवाब सहजता से दिया था।
मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, गौतम घोष, सईद मिर्जासई परांजपे आदि निर्माता निर्देशकों ने जब लीक से हटकर समाज और जीवन से जुड़ी फिल्मों का निर्माण शुरू किया तो कलाकारों की एक नई पीढ़ी आई जिसने अभिनय कला से फिल्म इंडस्ट्री में एक नया मुकाम हासिल किया। जीवन के प्रति एक नजरिया देने वाली सार्थक/समानांतर/कला फिल्मों को अपने अभिनय के दम पर लोकप्रियता दिलाने में ओम पुरी का एक अहम योगदान रहा। नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी, स्मिता पाटिल के साथ मिलकर ओम पुरी ने जो एक से एक शानदार फिल्में हिंदी सिनेमा प्रेमियों को दीं। इन लोगों ने अपने अभिनय से न सिर्फ समानांतर सिनेमा को पहचान दिलाई बल्कि लोकप्रिय भी बनाया। ओम पुरी समत इन चारों ने कला फिल्मों के प्रति लोगों का नजरिया ही बदल दिया। पहले जहां कला फिल्मों को एक खास वर्ग के लिए माना जाता था वहीं इन चारों लोगों ने उनको सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ साथ इंटरटेनिंग भी बनाया।
ओम पुरी ने आक्रोश, भवानी भवाई, अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है. सद्गति, मंडी, अर्धसत्य, मिर्च मसाला, जाने भी दो यारो, आरोहण, आक्रोश, भूमिका आदि कला फिल्मों में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी। यही नहीं उन्होंने मसाला (लोकप्रिय) फिल्मों में भी उसे रुतबे से काम किया जैसे कला फिल्मों में। चाची 420, हेराफेरी, चोर मचाए शोर और मालामाल वीकली इसके उदाहरण हैं। अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा में भी उनका योगदान कम नहीं है। आज के दौर में जब कोई बालीवुड स्टार विदेशी (हालीवुड) फिल्मों में काम करता है तो मीडिया की सुर्खियां बनता है। लेकिन ओम पुरी ने दुनिया के बड़े बड़े ?यातिलब्ध निर्माता निर्देशकों के साथ न सिर्फ काम किया बल्कि उनकी सराहना भी बटोरी। लेकिन वे चुपचाप अपने काम में जुटे रहे। डोमनिक लेपियर के उपन्यास पर बनी फिल्म सिटी आफ जॉय (1992) में पैट्रिक स्वायज के अपोजिट और वुल्फ (1994) में जैक निकल्सन के साथ था 1996 में द घोस्ट एंड द डार्कनेस में वाल किल्मेर के अपोजिट काम कर प्रशंसा बटोरी।
ओमपुरी ने 1976 में मराठी फिल्म घासीराम कोतवाल से अपना फिल्मी कैरियर शुरू किया तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। गोधुली (1977) उनकी पहली हिंदी फिल्म थी। 1980 में आई गोबिंद निहलानी की फिल्म आक्रोश में उनके लिए एक नया प्लेटफार्म लेकर आई। उस हिट फिल्म में उनके अभिनय ने दर्शकों को न सिर्फ सिनेमाघरों में जाकर देखने के लिए मजबूर किया।
ओम पुरी ने 300 से ज्यादा फिल्में की और एक से एक जबर्दस्त रोल निभाए। उनके टीवी सीरियल भी उतने ही शानदार और लोकप्रिय रहे। कक्का जी कहिन और मिस्टर योगी ने भी उनकी लोकप्रियता में चारचांद लगाए।
उन्होंने 10 पुरस्कार जीते और पांच बार उनको पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया। 2009 में उनको फिल्म फेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला तो 2016 में प्रॉग में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड देकर स?मानित किया गया। इसी तरह ओमपुरी को 1990 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सामाजिक यथार्थ की प्रतिनिधि कहानियां

आलोक वर्मा शेखर जोशी ‘ नई कहानी ’ के कथाकारों में से एक हैं। शायद वे अकेले कहानीकार हैं, जिसने नई कहानी के दौर में लिखना शुरू किया और आज भी उसी सक्रियता के साथ रचनारत हैं, जबकि अमरकांत जैसे एकाध कहानीकारों को छोड़ दिया जाए तो उस दौर के अधिकांश कथाकार पिछले कई सालों से ‘ न लिखने के कारण ‘ पर मनन कर रहे हैं। शेखर जोशी की पहली कहानी ‘ दाज्यू ‘ 1953-54 में छपी थी और अपनी पहली क हानी से वे चर्चित हो गए थे। अमूमन उनकी प्रकाशित सभी कहानियां चर्चा के केंद्र में रहती हैं। शेखर जोशी चूंकि नई कहानी आंदोलन की देन हैं, इसलिए उनकी कहानियों में उस दौर की प्रवृत्तियों का पाया जाना लाजिमी है। लेकिन किसी खास दौर की प्रवृत्ति में बंधकर वे नहीं रहे। उन्होंने समय की रफ्तार के साथ बदलते जीवन को देखा, परखा और जीवन की उसी संवेदना को, समाज को, समाज की उसी विडंबना को कहानियों के माध्यम से विश्लेषित किया। इस बारीक पकड़ ने ही उन्हें सदैव शीर्षस्थ कहानीकार बनाए रखा। अपने रचनाकर्म के बारे में शेखर जोशी ने लिखा है- ‘ छोटी उम्र में मातृविहीन हो जाने के बाद पर्वतीय अंचल के प्राकृतिक सौंदर्य से वनस्पतिव...
नाटक चालू आहे                           - आलोक वर्मा चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों के लिए विधानसभा चुनावों की तिथि घोषित कर दिए जाने के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी में पारिवारिक कलह रूपी नौटंकी लगातार जारी है। मीडिया को यादव परिवार की नौटंकी रोजाना कुछ न कुछ मसाला दे जाती रही है। लेकिन इसी बीच पंजाब में  च‌ुनाव प्रचार जोर पकड़ गया। पहले मंगलवार को दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के चुनावी भाषण पर तहलका मचा। मीडिया ने संसेशनल न्यूज के चक्कर में मनीष के बयान में थोड़ा से हेरफेर किया तो वह खबर हेडिंग बन गई। हुआ यूं कि सिसोदिया ने मोहाली की एक चुनावी सभा में कहा कि आप लोग यह मानकर आप को वोट  दीजिए कि केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं। वह आपके सारे काम करवाएंगे। लेकिन पत्रकारों ने सिसोदिया के बयान का दूसरा हिस्सा उड़ा दिया और यह चला दिया कि पंजाब के सीएम केजरीवाल होंगे। फिर क्या था , दनादन सभी दलों के नेताओं के बयान आने शुरू हो गए। अप...

सामाजिक सरोकार की कविताएं

शक्ति वर्मा  काव्य सृजन प्रक्रिया दो प्रमुख आधारों पर टिकी होती है। रचनाकार अपने अनुभवों द्वारा जीवन उद्देश्यों को काव्यरूप देकर संप्रेषणीय आधार प्रदान करता है। यह संप्रेषण काव्यगत सृजनात्मक विचारशीलता से सिद्ध होता है। डॉ मधुकांत की आलोच्य कृति  'मेरी ‌प्रिय कविताएं' में 150 कविताएं संकलित हैं। 207 पेज की इस पुस्तक में कवि ने मानवीय अनुभवों और के साथ-साथ  मानव और प्राकृतिक दुनिया के अलग-अलग पड़ावों के मार्मिक अनुभव प्रसंगों को उभारने वाले बिम्बों का प्रयोग किया है। इस संग्रह की कविताओं में लोक को भाषा के स्तर पर पिरोया गया है। इनमें कई कविताएं लोक अनुभव से निकली हुई हैं। कठोर अनुभव और सच्चाइयों से लबरेज बिंब कविता में ढलते हैं। पुस्तक की अधिकांश कविताएं छंदमुक्त हैं जो गैर -बराबरी पर आधारित व्यवस्था को चुनौती ही नहीं देतीं बल्कि पाठकों को सामाजिक सरोकार तक के लिए  भी अपने कार्यभार को चिह्नित करती हैं।  इन कविताओं की सार्थकता उनके सीधे सच्चेपन में हैं। ये कविताएं न कृतिम हैं और न ही सजावटी। इनमें कविि के मन की अंतरव्यथा उजागर हुई है जहां जीवन सिर्फ खुद के अस...