आलोक वर्मा
हिंदी में लघु पत्रिकाओं का प्रकाशन हमेशा से कठिन काम रहा है और वर्तमान में तो और भी कठिन हो चुका है। लेकिन फिर भी अभी भी कुछ लोग लघु पत्रिकाएं निकाल ही रहे हैं। आज जबकि सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफार्म बनकर उभरा है जहां आप जो चाहें लिख सकते हैं। वहां किसी तरह का दबाव नहीं है। सोशल मीडिया में लिखने की आजादी तो मिल गई लेकिन गुणवत्ता पर असर पड़ा है। जिसके मन में जो आता है उसे लिख डालता है। ऐसे में एक लंबे समय के लिए साहित्य को संजोये रखने में खासतौर पर वैचारिक स्तर पर लघु पत्रिकाओं की भूमिका और बढ़ गई है। वैसे तो आज के समय में साहित्य का नाम लेते ही एक खास विचार वाले आप पर पिल पड़ेंगे। उससे भी ज्यादा खतरा उनसे है जो गैरराजनीति का नारा देते हैं।
अगर वर्तमान हालात पर नजर डालें तो देश की दशा भी अच्छी नहीं है। हर तरफ असंतोष है, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने जनजीवन को त्रस्त कर रखा है। किसान मजदूर, व्यापारी से लेकर युवा तक हलाकान हैं। लेकिन कोई सुनवाई नहीं है। सरकारी तंत्र प्रताड़ित करने में लगा है तो विपक्ष कूढ़मगजी
का शिकार है। आम आदमी किससे दुखड़ा रोये। पिछले कई सालों से आंदोलन ठप है। छोटे मोटे आंदोलन होते हैं तो वे डंडे के बल पर दबा दिए जाते हैं।
मान लिया गया है कि आंदोलन का असर नहीं होता। लेकिन इधर किसानों के दो आंदोलनों ने दिखा दिया कि अगर एक हो जाएं तो सत्ता को सुनना ही पड़ेगा। राजस्थान और महाराष्ट्र के किसान आंदोलन एक सबक दे गए कि अपनी बात मनवाने के लिए एकजुट होना जरूरी है। इन आंदोलनों को भी इग्नोर करने की भरपूर कोशिश की गई। चूंकि मीडिया सत्ता की गोदी में बैठा हुआ है। मीडिया का चरित्र पूरी तरह बदल गया है। सच तो यह है कि उसे जनमानस की परवाह नहीं रही। वह सरकारी प्रचार का साधन बनकर रह गया है। किसान और श्रमिक या यों कहें कि उनके दुख दर्द से जुड़ी खबरों को उपेक्षा के भाव से ही देखता है।
खैर, पत्रिका पर लौटता हूं। नाम है सामयिक परिदृश्य। इसका छठा अंक कुछ समय पहले प्रकाशित हुआ है। इस पत्रिका को लेकर मेरा विशेष झुकाव इसलिए है कि जब इसका प्रकाशन शुरू किया गया था तो मैं इसके संपादकमंडल से जुड़ा हुआ था। तब मैं कलकत्ता में पढ़ाई कर रहा था। उस समय के सामयिक परिदृष्य के अंकों में विविघ विषयों पर सामग्री प्रकाशित हुई और लोगों ने उन्हें सराहा। काफी लंबे समय के बाद सामयिक परिदृश्य का प्रकाशन हुआ है। लंबे अंतराल के बाद प्रकाशित इस अंक में देश और समाज के सामने मौजूद संकट पर गंभीर विमर्श किया गया है। पिछले कई दशक में खासतौर पर नई आर्थिक नीतियों के बाद के देश दुनिया में आये बदलाव और साहित्य की भूमिका की चर्चा है। इस बदलाव ने पूरी दुनिया को झिंझोड़ कर रख
दिया। इस परिवर्तन का सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है रोजगार पर। देश में लगातार बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। इसके चलते और कई तरह की परेशानियां दिखाई दे रही हैं। जहां मुट्ठी भर लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है तो गरीबों की संख्या तेजी से बढ़ी है। असर यह रहा है कि गरीबों और अमीरों के बीच की खाई दिनोंदिन चौड़ी होती जा रही है। राजनीति का स्वरूप भी तेजी से बदला है, सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने की जगह
राजनीति में असहिष्णुता तेजी से बढ़ी है। अभिव्यक्ति की आजादी पर तरह तरह से अंकुश लगाया जा रहा है। साहित्य भी इससे अछूता नहीं है।
सामयिक परिदृश्य के ताजा अंक में विमल वर्मा अपने संपादकीय (अपनी बात) की शुरुआत काफ्का को उद्धृत करते कहते हैं- काफ्का ने अपनी डायरी में लिखा था - "लक्ष्य है लेकिन रास्ता कोई नहीं। " वे लिखते हैं कि इन पंक्तियों में केवल काफ्का की ही नितान्त निजी अनुभूति नहीं है, इसमें फासिज्म के भयावह आतंक से उपजा बीसवीं सदी का विक्षुब्ध, कातर, निरीह बौद्धिक आर्तनाद है। जिसने सत्ता और मनुष्य की स्वतंत्रता के बीच गहरी विध्वंसात्मक प्रक्रिया द्वारा मानवीय अस्तित्व के उन्मूलन का पैशाचिक अभियान चलाया था। नाजियों ने लोकतंत्र की अस्मिता पर इतना कठोर आघात किया था कि स्वाधीनता और मानवीय मूल्यों के दर्शन ने स्वतंत्रता, समानता, मातृत्व का जो ताना-बाना बुना था, मनुष्य के आत्मविश्वास और विश्व जगत के बीच जो
सेतु बनाया गया था वह भहरा दिया गया। यह ट्रैजिक प्रक्रिया इतनी वीभत्स और दारुण थी कि इसने मनुष्य से उसका गौरव छीन लिया। जेनेवा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर प्रख्यात लेखक जार्ज स्टाइनर ने "लैंग्वेज एंड साइलेंस" नामक पुस्तक में युद्धोत्तर जर्मनी के बारे में लिखा है- "ऊपर से जिंदगी का ऐश्वर्य मुक्त उन्माद दिखता है, लेकिन भीतर एक अपूर्व खामोशी है। सन् 1914 के विश्वयुद्ध के लिए जिस तरह से सैनिकों ने मार्च किया, उसी तरह शब्दों ने भी। जो सैनिक बचकर लौट आए, चार वर्ष तक युद्ध में रहकर, वे सब दबे कुचले पराजित थे। लेकिन सही अर्थों में शब्द नहीं लौटे। वे वहीं फ्रंट पर रह गए।" इस कोट के बाद विमल वर्मा लिखते हैं- यह उद्धरण हम इसलिए दे रहे हैं कि आज हमें वैसी पगध्वनि की आहट की आशंका दिखाई पड़ रही है।
संपादक विमल वर्मा इस तरह से आज के हालात का आंकलन करते हैं। इसी लेख में वे आगे अंग्रेजी कवि डेविड लाज की कविता "यदि कवियों को झंडे रखने चाहिए" को उद्धृत करते हैं-" वे मांगते हैं /अपनी तानाशाही सजाने के लिए /कविताएं/जिनमें अतड़ियां लगे पाताकाएं सी/खून लगे पताकाएं सी/खून लगे शराब सा/मृत्यु लगे नीद सी/वे मांगते हैं/कत्ल हुए लोगों की कब्रों पर छितराने के लिए/मालाएं/दुर्गंध को बहा ले जाने के लिए/महकते शब्दों की कटी पंखुड़ियों वाले /फूलों के गुच्छे/वे चाहते हैं /छन्द के खुदे मकबरे में/गुस्सा दफना दिया जाए/वेदना की चीखों को/काल्पनिक संगीत में भुला दिया जाए/हत्याकांड के नाद को /वाद्यराज (आर्गन) की गूंज में /डुबा दिया जाए/ वे चाहते हैं कवि को बनाना/पिंजरे में गाने वाला एक पक्षी/गायक मंडली का एक हिजड़ा/ कला का दास/जो चांदी की ठनठनाती जंजीरों से /अपनी मनोव्यथा की हथकड़ी पहनाएं/ हम इनकार करते हैं।... "
वे लिखते हैं - याद रखिए वैचारिक केंद्रीयता (Idealogical Centralism) जीवन के सभी पहलुओं के साथ चिंतन की एकरूपता एक चिंतन प्रणाली तथा उद्देश्य की एकता हासिल करने के सचेत संघर्ष के जरिए ही की जा सकती है। यद्यपि हम भी जानते हैं कि यह संघर्ष राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आंदोलनों को संयोजित करके ही किया जा सकता है। परंतु वैचारिक कार्य पद्धति इस बात पर निर्भर करती है कि जिस युग या कालावधि से हम गुजर रहे हैं उसकी आत्मगत और वस्तुगत विशेषताओं को कितने समीचीन तरीके से देखते हैं।
इस अंक में नव उदारवाद और वर्तमान हिंदी कविता शीर्षक से प्रकाशित लेख में आनंद प्रकाश ने कविता के साथ समाज के बदलते मिजाज पर विस्तार से चर्चा की है। " पिछले दो तीन दशकों से ऐसे बदलाव देखने को मिले हैं जिन्होंने हिंदी लेखन के परिदृश्य को निर्णायक रूप से प्रभावित किया है। मसलन मध्यवर्ग पहले भी था, लेकिन आज की नई स्थिति में वह मूल्य विहीनता की तरफ कमोवेश तेजी से बढ़ा है। उसकी प्राथमिकताएं सफलता केंद्रित हुई हैं और वह स्वयं को पूरी तरह आधुनिक मानता है, इस तरह कि उसका आदर्श तकनीकी के इर्द गिर्द घूमती भाषा में पल बढ़ रहा है और वहां मूल्यों की जगह निजी प्रगति ने ले ली है। इस स्थिति में रचना की शक्ल अलग किस्म के मानदंडों से निर्धारित हो रही है। कविता पर नजर डालें तो पाते हैं कि
उसमें शब्द प्रयोगों की बहुतायत है। गौर करें तो पाते हैं कि उसी मध्यवर्ग में जिसकी तरफ ऊपर इशारा है गंभीर हस्तक्षेप मौजूद हैं, अनेक बार उसे देखकर शासक वर्ग भी सकते में आ जाता है। "
असल में आज का युवा वर्ग का निर्माण जिस काल में हुआ उसमें स्कूली ढांचा तहस नहस या परिवर्तित हुआ है।सरकारी स्कूलों की कमजोर व्यवस्था ने मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से को वहां के पाठ्यक्रम, अध्यापन और व्यापक माहौल से बाहर कर दिया। यह प्रक्रिया अस्सी के दशक में शुरू हुई और नब्बे तक आते-आते शिक्षा संरचना में आमूल परिवर्तन आ गया। जो आज 25 साल का लेखक है वह यदि छोटे शहर या फिर कस्बे में पैदा हुआ तो वह प्राइवेट स्कूल से पढ़कर आाय है। इसमें लेखक के परिवार को, उसके मां-बाप को कितनी मशक्कत करनी पड़ी है यह छुपा नहीं है। संबंधित परिवारों द्वारा वहां बाकी के खर्चों में कटौती हुई, कर्ज लेकर पढ़ाया गया है। मूलभूत संसाधनों मसलन घर, जमीन आदि को बेचा -गिरवी रखा गया। लड़कों को प्राथमिकता देकर
लड़कियों को स्कूल से बीच में निकाला गया है या उनकी शिक्षा का परिसीमन हुआ है, आदि-आदि कारक हैं। पचीस वर्ष का लेखक ऐसा वातावरण देख पाया है जिसमें संवाद और दुतरफा झगड़े होते हैं।
नब्बे के दशक की सचाई जिसका ताल्लुक निजीकरण, उदारवाद और तथाकथित मुक्त अर्थव्यवस्था के प्रभावी आगमन से था। नब्बे का दशक सब्ज बाग दिखाने से शुरू हुआ था। उसी से महसूस होता था कि भारतीय अर्थव्यवस्था गहरे संकट की स्थिति में है और विश्व पूंजीवाद को उसे अपने गिरफ्त में लेने का सही अवसर मिल गया है। निजी क्षेत्र के प्रभावी उभार के साथ-साथ शिक्षा महंगी हुई है, उसका स्तर गिरा है और व्यापक जीविका के साधनों में गंभीर कटौती का आलम दिखता है। क्या यह मात्र आर्थिक वातावरण का मसला है या विचार और संस्कृति के सवाल भी इसके अंतर्गत विभिन्न रूपों में उठते-बनते बिगड़ते हैं। यहां आर्थिक अभावों के मद्देनजर सच-झूठ, उपयोगी-अनुपयोगी, गलत सही जैसे जीवन मूल्यों का निर्धारण होता दिखे तो आश्चर्य न होगा। जैसे शिक्षा महंगी हुई तो अध्यापकों की परिभाषा अपने आप बदली है। वे गुरु और ज्ञानार्जन में मददगार साबित होने वाले वरिष्ठ नागरिक न होकर ज्ञान को मात्र बेचने वाले सेल्समैन जैसे नजर आते हैं।
युवा कवियों को जो वातावरण मिला वह तकरीबन ऐसा ही रहा है। उसके शिक्षा की नींव ही दरकी हुई है। वह असमंजस का शिकार है और सच्चाई और स्वप्न की भूलभुलैया में फंसकर रह गया है। आज का कवि उलझा है, वास्तविक जिंदगी के रोजमर्रा के मामूली सवालों से मुखातिब है, और वहीं अपनी वैचारिक भावनात्मक मुश्किलों का प्रभावी हल ढूंढने में लगा है।
डा आनंद प्रकाश अपने लेख में इन मुद्दों, विसंगतियों पर विस्तार से विचार करते हैं। वे सोवियत रूस में समाजवाद के विघटन के असर का भी जायजा लेते हैं कि किस तरह से उसका असर विश्वव्यापी व्यवस्था पर पड़ा। भारत में उसका असर इतना गहरा पड़ा कि भारत का श्रमिक तबका असहाय सा हो गया और पूंजी के निजी क्षेत्र की बन आई। इसके साथ ही लेखक नई कविता, प्रयोगवाद, जीवन दर्शन और चिंतन दर्शन, शास्त्रीय दर्शन आदि पर विस्तार से नजर डालते हैं। पचास-साठ के दशक में वैचारिकता में आए परिवर्तन, विचारधारा का रचना प्रक्रिया पर असर, भाषा शैली आदि के माध्यम से कवियों और उनकी कविताओं के द्वारा कविता में आए बदलावों की चर्चा करते हैं।
" रचनाकार की विचारधारा का उसकी रचना - प्रक्रिया पर क्या असर पड़ता है, इसकी बड़ी दिलचस्प मिसाल शील की कविताएं है। शील की प्रारंभिक रचनाएं छायावादी शैली में हैं, लेकिन मजदूरों के बीच में रहने के कारण आंदोलन की जरूरत के मुताबिक उन्होंने उसी छंद -विधान या 'पैटर्न' को अन्दर से बदला। उन्होंने गीत लिखे, मुक्त छंद नहीं। नरेंद्र शर्मा का भी उदाहरण दिलचस्प है। वे बड़ी तेजी से प्रगतिशील आंदोलन में आए और जिस 'फार्म' में पगे हुए थे, उसे छोड़कर आल्हा छंद में कविता लिखी। रूस पर उन्होंने कविता लिखी। लेकिन रचनाकार किसी आंदोलन से दो तरह से जुड़ता हैः एक तो केवल वैचारिक स्तर पर, दूसरे वैचारिक के साथ-साथ सामाजिक स्थिति या कर्म के स्तर पर भी। शील और नरेंद्र शर्मा दोनों प्रगतिशील आंदोलन से जुड़़े, लेकिन शील जुड़े़ रहे, नरेंद्र शर्मा बाद में उससे अलग होकर दूसरी दिशा में चले गए। इसका कारण यही हो सकता है कि नरेंद्र शर्मा केवल वैचारिक स्तर पर जुड़े थे, जबकि शील सामाजिक स्थिति और कर्म के स्तर पर भी प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े थे। (उद्भावना- 97, 324) इस तरह से लेखक ने विस्तार से कविता में आए बदलावों पर चर्चा की है। समाज में व्याप्त तात्कालिक दबावों, सामाजिक आर्थिक हालात और उसके चलते बदलता वैचारिक परिदृश्य कैसे कविता पर असर डालता है उस पर गंभीर विमर्श करते हैं।
इसी तरह से एक महत्वपूर्ण लेख बाबा नागार्जुन की कविता "हरिजन गाथा" पर "वास्तविक वस्तुनिष्ठता की आत्मपरक संरचना " शीर्षक से परशुराम ने लिखा है। बाबा नागार्जुन का रचनाकर्म बहुत वृहद है। उपन्यास, कविता, कहानी तकरीबन सभी विधाओं में उन्होंने लिखा है। उनको जनकवि का दर्जा हासिल है। वे आम आदमी के पक्षधर हैं। वह व्यवस्था परिवर्तन में जनता की भागीदारी चाहते हैं। वह सामाजिक परिवर्तन और वह भी क्रांतिकारी परिवर्तन के पक्षधर थे। बाबा नागार्जुन जनता की आवाज को स्वर उसी की भाषा में देते हैं। कह सकते हैं कि उनकी कविताएं तात्कालिक टिप्पणी भी हैं। परशुराम लिखते हैं- उनकी कविताएं तात्कालिक समय का केवल बयान ही प्रस्तुत नहीं करतीं बल्कि उसमें हस्तक्षेप भी करती हैं। ताकि सामाजिक रूपांतरण में
व्यापक जनसमुदाय परिवर्तन के लिए संकल्पित हो सकें। इस प्रकार उनकी कविताओं में कलात्मक संवेदना और सामाजिक संवेदना घुल मिलकर गहरा प्रभाव डालती हैं। नागार्जुन की राजनीतिक कविताओं के बारे में उनका कहना है... किंतु जनता के संघर्षों में सहभागिता, सजग आत्म-दृष्टि, जनपक्षधरता और
आलोचनात्मक विवेक के चलते उस खाई से निकले भी। बावजूद इसके यह भी सच है कि कभी भी उन्होंने लोक-तंत्र के हिंसकों से कोई समझौता नहीं किया।राज्य सत्ता के विरुद्ध जनता के संघर्षों में उनका सकर्मक समर्थन रहा। कविता में भी और कभी-कभी व्यक्ति के धरातल पर भी।
बाबा नागार्जुन केवल कविताएं लिखते भर नहीं थे बल्कि उस जीवन को जीते भी थे। उनके जीवन पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है। परशुराम जी लिखते हैं- नागार्जुन के लिए लिखना भी एक राजनीतिक कर्म था और जीना भी। वह ' घर' में घुसकर लिखने वाले कवि नहीं थे। वह कबीर और निराला की परम्परा के कवि थे। उन्होंने ' विषकीट ' में लिखा भी है कि कबीर से मैंने दो टूक अख्खड़पन लिया और निराला से स्वाभिमान का संस्कार।'
नागार्जुन के समूच सामाजिक राजनीतिक सामाजिक बोध और अनुभव के निचोड़ को हम इन पंक्तियों में देख सकते हैं- हरिजन गाथा की पंक्तियों को देखिए- 'दिल ने कहा - दलित मांओं के/सब बच्चे अब बागी होंगे /अग्निपुत्र होंगे वे अंतिम /विप्लव के सहभागी होंगे।... इसकी अपनी पार्टी होगी /इसका अपना ही दल होगा /जनबल धनबल सभी जुटेगा /हथियारों की कमी न होगी।' वहीं दूसरी तरफ लिखते हैं- हिंसा और अहिंसा दोनों /बहने इनको प्यार करेंगी। ' लेखक के शब्दों में कहें कि ' हरिजन- गाथा' नागार्जुन की ' सहानुभूति' की नहीं बल्कि 'स्वानुभूति' की कविता है क्योंकि यह कविता प्रत्यक्ष अनुभव प्रकरणों और तंतुओं से बंधी है। यह वर्चस्ववादी संस्कृति के विरुद्ध एक नई संस्कृति के सृजन की ओर संकेत करते हैं। एक ऐसी संस्कृति जिसका आधार लोकतंत्र हो और हाशिये पर फेंक दिए गए लोगों को सम्मानित स्थान दे तथा सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका स्वीकार करे। आज देश में जो जन विरोधी, दलित विरोधी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति चल रही है, उसमें यह कविता हस्तक्षेप करती है।'
परशुराम जी की इस लेख में बाबा नागार्जुन के व्यक्तित्व और कृतित्व के हर पहलू पर नजर डाली गई है। हरिजन-गाथा के बहाने लेखक नागार्जुन के कवि पक्ष के साथ साथ उनकी राजनीतिक वैचारिक सोच, जन आंदोलनों से कविता और खुद कवि का जुड़ाव और उसका असर, लेखन का जीवन पर और जीवन का लेखन पर असर, समाज की विसंगतियां और उससे संघर्ष पर बड़ी बारीकी से विचार करता है। यह लेख नागार्जुन के संबंध में एक धरोहर जैसा है।
बोलना बहुत जरूरी है
आज देश में जन-विरोधी, दलित विरोधी और राजनीतिक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति चल रही है। पूंजी का स्वरूप बदल चुका है। वह भूमंडलीकृत हो चुकी है। किंतु समाज में राजनीतिक सांस्कृतिक दमन उग्र रूप धारण कर चुका है। इसके साथ ही असहिष्णुता चरम पर है। सामाजिक असमानताएं और विषमताएं अतिरेक में हैं। समाज का एक बड़ा तबका इन बुराइयों से परेशान है। लेकिन इनके खिलाफ एकजुटता का वातावरण तैयार नहीं हो पा रहा है जिसके कारण वे पराजय और निराशा-बोध के कानन में भटक रहे हैं।
सामयिक परिदृश्य के यह अंक में साहित्य के साथ साथ उन सभी सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की गई है जो समाज को परेशान किए हुए हैं। पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं की विशेषता भी यही है कि वे मनुष्य के सामने आने वाली दिक्कतों और परेशानियों के सवालों से बार बार टकराती हैं और एक दिशा देने की कोशिश करती हैं।
वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा का गीत 'मौकापरस्तों का सहगान' और श्रीहर्ष की कविता 'रंगों की टकराहट' ध्यान खींचती है। विष्णुचंद्र शर्मा अपनी कविता में मौका परस्तों की जबरदस्त तरीके से लानत मलानत करते हैं। अपनी कविता में वह राजनेताओं, साहित्यकारों, नौकरशाहों सभी पर व्यंग्य करते हैं, सबकी खबर लेते हैं। कविता का शीर्षक 'मौकापरस्तों का सहगान' पढ़ते ही पाठक के जेहन में यह बात आ जाती है कि किसी न किसी उस व्यक्तित्व का चित्रण कविता में होगा जो मौके के अनुरूप खुद को बदलकर लाभ उठाने में आगे रहते हैं। गीत है- 'बड़े सेठ का जूता खाओ हर गंगे।' आज के दौर में जब पैसा ही परम सत्य बनकर रह गया है और हर व्यक्ति येनकेन प्रकारेण उसके चक्कर में लगा हुआ है। जहां मनुष्य की योग्यता उसके ज्ञान से नहीं, बाहरी चमक दमक से आंकी जा रही है। ऐसे में पूंजीपति/सेठ ही लोगों के भगवान बन गए हैं। सेठों के दरबार में विद्वानों की जगह किस काम की। ऐसे हालात में पैसा और तरक्की का एकमात्र साधन सेठ की कृपादृष्टि ही बचती है। और सेठों के राज में वही सफल हैं जो सेठों का जूता उठाने और खाने के लिए तैयार हैं। अगली पंक्तियों पर गौर करें- 'मारे अमरीका तो गाओ हर गंगे/नेता कहे वही दुहराओ हर गंगे' अब देखिये अमरीका क्या है, साम्राज्यवाद का
प्रतीक अगुवा। वह जो कह रहा है वही सही है। अपने आधिपत्य के लिए वह दुनिया भर के देशों को बर्बाद कर रहा है। जिसने भी उसकी बात मानने से इनकार किया या उसके फायदे में रोड़ा बनने की कोशिश की उसे नेस्तनाबूद कर दिया। इराक, अफगानिस्तान आदि राष्ट्र उसकी बात न मानने की सजा भुगत रहे हैं। नया निशाना उत्तर कोरिया है। कितने दिनों तक वह बचा रहता है। अमेरिका के विरोध में आज कोई बोलने की स्थिति में नहीं है। उसकी नीतियों की नकल में सारी दुनिया लगी हुई है, किसी को जनता के अच्छे भले की परवाह नहीं है। अमेरिका साम्राज्यवाद का अगुवा है। साम्राज्यवाद का चरित्र है उसकी हां में हां मिलाओ नहीं तो बचोगे नहीं। इसी तरह कविता में विष्णुचंद्र शर्मा राजनेताओं, कवियों सबको नंगा करते हैं।
श्रीहर्ष की कविता 'रंगों की टकराहट' कविता आकार में छोटी है परंतु विस्तृत फलक समेटे हुए है। रंगों को प्रतीक बनाकर लिखी गई यह कविता वर्तमान समय की राजनीति और सत्ता के चरित्र को बेनकाब करती है। कविता की शुरुआत है.. रंगों की आपसी टकराहट/ कैनवास पर उभरने लगी है/ भीतर का द्वन्द-रेखाओं के/ टेढेपन में बोलने लगा है/ चमक-आकर्षण पर धुंध फैलने लगी है। इसे वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो सभी राजनीतिक दलों की पहचान उनके चुनाव चिह्नों के साथ उसके रंगों से होती है। भाजपा की पहचान भगवा रंग से है तो समाजवादी पार्टी की पहचान रहें और बसपा की पहचान नीले रंग से है। कम्युनिस्टों की पहचान लाल रंग से की जाती है। इसके साथ ही रंग को शासक और आम जनता के प्रतीक के तौर पर देखें तो कवि का कहना है कि कैनवास पर शासक वर्ग और जनता के बीच का टकराव दिखाई पड़ने लगा है। जनता को सत्ता महत्व देती नहीं है। उनकी नजर में जनता का कोई मूल्य नहीं है। जनता और सत्ता के बीच द्वंद मुखर होने लगा है। लोक लुभावने और बड़े- बड़े वादे करके सत्ता हासिल करने के बाद जब पोल खुलती है और जनता की मुसीबतें ज्यादा बढ़ जाती हैं तो जहां उसके दिमाग से सरकार और उनके नेताओं के प्रति रोष भाव बढ़ता है वहीं सत्ताधारी नेताओं के चेहरे पर जनता में बढ़ती बेचैनी और रोष से तनाव आ जाता है और असलियत सामने आने पर जो चमक आकर्षण है उस पर धुंध फैलने लगी है।
कविता की अगली पंक्तियां हैं- 'सफेद के नीचे छिपे काले दाग/ उभरकर सामने आ गये हैं/ काला रंग टोपी पहन-जूते बजा / आतंक फैला रहा है/ पीले के उफनते गुस्से ने चेहरों को/ पीलाकर दिया है/ लाल रंग घायल होकर -अंधेरे में / खुसर फुसर कर रहा है / नीला हरा अपनी जगह की तलाश में भटक रहे हैं/ रंगों की टकराहट बढ़ती जा रही है / कैनवास मौन ताक रहा है।'
झूठ और फरेब के दम पर दुनिया में मायावी सपने दिखाकर जनता को कितने दिनों तक धोखा दिया /बहकाया जा सकता है। हकीकत ज्यादा दिन छिपती नहीं। चुनाव में बड़े बड़े वायदे कर सत्ता हासिल करने के बाद जब वादे पूरे नहीं होते तो जनता नेताओं के काले चेहरों को पहचान लेती है। बहुमत के चमक का आकर्षण फीका पड़ने लगा है। मुखौटा हट जाने पर जहां जनता नेताओं के प्रति गुस्से में है तो नेता असलियत का पर्दाफाश होने से जनता से नाराज है। उसका परिणाम यह होता है कि जगह जगह जनता सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरती है और सत्ता के निर्देश पर जनता का पुलिसिया दमन शुरू हो जाता है। लोगों के हक की लड़ाई करने वाले लाल रंग भी बेदम हो चुका है, उसके नेता और कार्यकर्ता भी अंधेरे में भटक रहे हैं या भटकाव के शिकार हैं।
नीले और हरे रंग वाली पार्टियों के नेता अपनी अपनी जगह तल ाशने में लगे हुए हैं। जनता मौन होकर राजनीतिक दलों के तमाशे देख रही है।
वैसे तो भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की अपनी परिभाषा है। लेकिन जब वह सत्ता में होती है तो उस पर बहस तेज हो जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के समय से ही राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को हिंदू धर्म से जोड़कर बांटने की साजिश रचता आ रहा है। इस वर्चस्वकी लड़ाई के लिए मुसलमान और ईसाई हमेशा उसके निशाने पर रहे हैं। उसकी जब भी सरकार बनी है तो सांप्रदायिकता की तपिश तेज हुई है। पिछले समय में चूंकि भाजपा कभी अपने बूते बहुमत की सरकार केंद्र में नहीं बना पाई थी इसलिए ज्यादा आक्रामक नहीं रही। लेकिन पिछले आम चुनाव में उसे भारी बहुमत मिला तो अपना एजेंडा पूरा करने में उसे आसानी हो गईं। आरएसएस के हिंदुत्व के एजेंडे को खुले रूप में परवान चढ़ाया जा रहा है। उसके कार्यकर्ता जगह-जगह अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। आम जनता से लेकर उनकी विचारधारा की मुखालफत करने वाले बुद्धिजीवियों, साहित्यकार, पत्रकार वर्ग भी उनके निशाने पर है और उनकी हत्या की जा रही है। पनसारे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या कर दी जाती है और इन हत्याओं की भर्त्सना करने वाले उनके निशाने पर होते हैं। उनके समर्थक जगह जगह दलितों को निशाना बनाते हैं। किसी न किसी तरह विश्वविद्यालय उनके निशाने पर हैं। जहां उनका असर नहीं है वहां अकादमिक व्यवस्था को नष्ट किया जा रहा है। विश्वविद्यालयों में छात्रों और टीचरों पर न सिर्फ हमले हो रहे हैं बल्कि ग्रांट रोक कर या कुलपतियों के सहारे वहां के पठन पाठन में अवरोध पैदा किया जा रहा है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय खासतौर पर उनके निशाने पर रहा है।
महत्वपूर्ण यह लोकतंत्र के लिए खतरा है और वर्तमान में यह खतरा लगातार बना हुआ है। सामयिक परिदृश्य में प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर और अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक के लेख राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता पर हैं। रोमिला थापर अपने लेख 'धर्म -आधारित राष्ट्रवाद पूरे जोर शोर से वापस आ गया है ' में प्रचारित किए जा रहे राष्ट्रवाद की पड़ताल करती हैं। वे लिखती हैं कि - 'एक ऐसे समाज में कार्यशील लोकतंत्र की स्थापना करना मुश्किल है, जहां पर विशेषाधिकार प्राप्त और वंचित समूहों की विशेष श्रेणियां, घटते - बढ़ते अधिकारों के साथ धार्मिक पहचानों पर आधारित बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक समुदाय; और ऐसी विचारधारा है जो द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन करती है, जहां पर धर्म, जाति और भाषा पहचान बन जाती है। यह मुश्किल इसलिए है
कि लोकतंत्र के लिए इसे उलट देने की जरूरत होती है- इसका अर्थ सभी के लिए समान अधिकार और सभी नागरिकों पर लागू कानूनों मं समानता है।' वे सवाल करती हैं- क्या धार्मिक एवं सांस्कृतिक अतिवाद की विचारधाराएं निरपवाद रूप से पहले के उपनिवेश के समाज और संस्कृति की व्याख्याओं से उत्पन्न हुई हैं, जैसा कि उपनिवेशवादियों द्वारा निर्मित किया गया है? दूसरे शब्दों में क्या हमें उन पहचानों को समर्थन देना होगा जिन्हें ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने हमारे ऊपर थोपा था ? क्या हम इसके बजाय इन पहचानों पर सावल नहीं उठा सकते और विकल्पों पर विचार नहीं कर सकते। इस तरह की पहचानों की निरंतरता अंतर्निहित रूप से लोकतंत्र विरोधी है। वे उपनिवेश चाहते थे न कि स्वतंत्र लोकतंत्र।'
सांप्रदायिकता क्यों फैल रही है इसके कारणों और समाधान कैसे किया जा सकता है, इस पर विचार करते हुए रोमिला लिखती हैं- सांप्रदायिकता अंततः इस मान्यता पर आधारित लोगों के मध्य की ऐसी विचार-पद्धति है कि उन्हें अपने आकाओं के द्वारा जो कुछ भी बताया गया है, उन्हें बस उतना ही जानना चाहिए। यह बेहतर चीज को जानने की अनिच्छा को दर्शाता है। अतएव एकमात्र धार्मिक समुदायों 'फिर चाहे बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक' का अंततः सीमित उद्देश्य होता है। यह साम्प्रदायिकता का खात्मा नहीं करेगा।
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि हमें ऐसे अन्य तरीकों के बारे में सोचना होगा, जिनके द्वारा पहचानें विकसित की गयी हैं। ऐसा जान पड़ता है कि हम उस बिंदु पर पहुंच गए हैं जबकि सांप्रदायिक विचारों एवं गतिविधियों को वैध राष्ट्रवाद के रूप में लिया जाता है। हमें राष्ट्रवाद को सांप्रदायिकता से अलग करना होगा। किसी भी समूह के पास यह दावा करन का एकाधिकार नहीं है कि केवल उसकी ही गतिविधियों से राष्ट्रवाद का निर्माण होता है और दूसरे सभी राष्ट्रविरोधी हैं। हमें समावेशी, धर्मनिरपेक्ष अंदाज में राष्ट्रवाद को पुनः निर्मित करना है, जिससे प्रत्येक भारतीय को बराबर मात्रा में और समान अधिकारों के साथ भागीदारी करने का अवसर प्राप्त हो।'
प्रभात पटनायक अपने लेख 'राष्ट्रीय' होने का अर्थ क्या है? में बताते हैं कि राष्ट्रीय, राष्ट्रीयता तथा राष्ट्र राज्य की शब्दावली 17 वीं शताब्दी में वेस्ट फाइनेंसियल पीस ट्रिटी के बाद प्रचलन में आई थी। लेकिन यूरोपियन राष्ट्रवाद की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं- पहली- इसमें पूरी आबादी एक ही राष्ट्र का भूभाग होने के बावजूद नहीं आती है। इसमें हमेशा अपने भीतर ही शत्रु ( उदाहरण के लिए यहूदी) होते थे। दूसरे, पूरी तरह से औपनिवेशिक था। वेस्ट फेलियन ट्रीटीज के एक महीने के अंदर -अंदर ओलिवर कामवेल ने आयरलैंड पर हमला किया (जो कि जीता हुआ पहला उपनिवेश था) तथा इंग्लैंड ने पूरे भू क्षेत्र पर अपना कब्जा जमा लिया था। तीसरे, राष्ट्र अपनी महिमा स्वयं गाते रहे। इसके पीछे कारण था राष्ट्र को मजबूत बनाना। यह कोई व्यापारिक धारणा नहीं थी; जैसा कि आमतौर पर माना जाता है। यह शास्त्रीय राजनीतिक अर्थशास्त्र का आधार भी है।
---- जब गांधी जी ने अपने अंतिम दिनों में विभाजन की विभीषिका के खिलाफ तथा कांग्रेसे नेताओं के लाख विरोध के बावजूद पाकिस्तान को पावना देने पर जोर दिया तो यह राष्ट्रविरोधी नहीं था, वे सिर्फ जनतांत्रिक राष्ट्रवाद को स्वीकृति दे रहे थे। आजादी की लड़ाई को ध्यान में रखते हुए उनका यह कार्य सही था। इसके केंद्र में सहन शक्ति, संरक्षण, समझौता का - मतभेद के लिए शक्ति प्रदर्शन नहीं था, अपना दबदबा दिखाना भी नहीं था। इस राष्ट्रवाद की मांग है कि अगर देश में कहीं राष्ट्रविरोधी नारे लगते हैं तो चूंकि उनमें आतंकवादी हिंसा या भड़काऊपन नहीं है तो यह समय आत्ममंथन का, विश्लेषण का है ताकि आपसी विरोध दूर हों न कि उन पर षड्यंत्र करने का उपनिवेशी कानून लागू किया जाए जैसा कि आज हो रहा है।
पटनायक इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि आक्रामक राष्ट्रवाद के प्रति झुकाव भी देश में खासतौर पर नई उदारवादी नीतियों के चलते ही आया। भाजपा इसका पूरा समर्थन करती रही है। ... लेकिन भारत को एक राष्ट्र बनाने के लिए ये हानिकारक रुख है।
पत्रिका की एक महत्वपूर्ण धरोहर फिल्मकार ऋत्विक घटका का साक्षात्कार है। यह साक्षात्कार बांग्ला की चित्रवीक्षण पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। किसने इस इंटरव्यू को लिया और कब लिया अनुवादक ने यह जानकारी नहीं दी है। इसका अनुवाद किया है कमलेश पांडेय ने । लेकिन इस इंटरव्यू में ऋत्विक घटक बहुत खुलकर सिनेमा में दर्शन, प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक परम्परा के संबंध में दृष्टिकोण, सिनेमा संबंधित आदर्शवादी पृष्ठभूमि और कलाकारों की आजादी के प्रसंघ, जुंग के अनकांसेसनेस तत्व (समेकित अवचेतन), वर्गीय कला संस्कृति, मदर काम्पलेक्स जैसे सवालों का खुलकर जवाब देते हैं तथा सामाजिक द्वंद्वों का मार्क्सवादी विश्वेषण करते हैं। इसके साथ ही वे अपनी सभी फिल्मों, उनके पात्रों, उनकी रचना के विषय वस्तु पर अपनी बात कहते हैं। चरित्रों की विसंगतियों से संबंधित एक सवाल के जवाब में ऋत्विक 'युक्ति तक्को आर गल्पो' का सांवली के चरित्र के बारे में वे कहते हैं कि सांवली का चरित्र कोई वास्तविक चरित्र नहीं है, किन्तु किसी भी वास्तविक पात्र के साथ उसकी एकरूपता मानों अटूट है। ... इसके साथ ही मैंने इस चरित्र के जरिये पूरे बांग्लादेश को उजागर करने की कोशिश की है। अपने देश की फिल्मों में हमेशा बंगाली लड़कियों को नखरे दिखाते, खुश मिजाज, पवित्र दिखाया जाता है, लेकिन बंगाली लड़िकयां वही भर नहीं हैं। इसलिए मैंने एक सशक्त लड़की का चरित्र गढ़ा है और उसके जरिये पूरे देश की आत्मा को दर्शाने की एक कोशिश की है। मूल बात यह है कि सभी फिल्मों में किसी चरित्र के माध्यम से मैं किसी न किसी विचारधारा को व्यक्त करने की कोशिश करता हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं इस दुनिया के बाहर का कुछ करता हूं।
उनकी फिल्मों में पुराण, मिथक तथा आधुनिक जीवन के घुलमिल जाने संबंधी एक प्रश्न के उत्तर में ऋत्विक कहते हैं- मुझे सबसे अधिक भारतीय प्राचीन परम्परा, उसमें ऋग्वेद से शुरू कर संहिताएं ब्राह्मण, आरण्यक, श्रुतियों के सभी अंश, उपनिषद, स्मृति, पुराण एवं महाकाव्य आकृष्ट करते हैं। ... प्राचीन ऋषि मुनि या इन्हें जो कुछ भी कहा जाए, वे लोग जो भी थे, उन्होंने कितनी गंभीरता से मानवीय मनोविज्ञान का विश्वलेषण किया था। .. उन सबको एक बार फिर सामने लाने की आवश्यकता है- सामने लाकर उन सबको वर्तमान जगत से मौजू करना होगा, यह पहली प्राथमिकता है। ... अपने देश की धड़कन के साथ संबंध कायम रखने की नितांत आवश्यकता है। अपने देश की जनता को उससे काफी जल्द हम आश्वस्त कर सकते हैं, बहुत जल्द उनके दिल जीत सकते हैं।
इसके अलावा इस अंक में व्यवस्था-सत्ता - पुरस्कार में डॊ कर्ण सिंह चौहान ने साहित्यकारों, कलाकारों पर लगातार हमलों और हत्या को लेकर असहिष्णुता के विरोध में देश भर में लेखकों, कवियों और कलाकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने के मुद्दे पर टिप्पणी लिखी है। उनका कहना हे कि सरकार या सरकारी प्रतिष्ठानों से पुरस्कार लिए ही नहीं जाने चाहिए। राजेश्वर सक्सेना न कारपोरेट संस्कृति का विमर्श में समुदाय और भीड़ की अवधारणा के नये युग में एक नये तरह के समाज के नये परिदृश्य के विकास पर रोशनी डाली है। मनीष कुमार 'कृषि संकट और कृषक आत्महत्या' लेख में खेती और किसानों की दुर्दशा पर विचार किया है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक धीरेंन्द्र नाथ गंगोपाध्याय के लेख ' फासीवाद की दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि ' में फासीवाद क्या है और कैसे विकसित हुआ है। और फासीवाद का समाज पर असर क्या पड़ा इस पर गंभीरता से चरचा की है।
इसी तरह इस अंक में कुशेश्वर, संतोष चतुर्वेदी की कविताएं भी पठनीय हैं।
समीक्षिक पत्रिका- सामयिक परिदृश्य (अंक -6)
संपादक- विमल वर्मा, श्री हर्ष
प्रकाशक- दया शंकर अष्ठाना
संपर्क- एच-13, एल .आई.जी. एस्टेट
8/1 रुस्तमजी पारसी रोड
काशीपुर, कोलकाता- 700002
हिंदी में लघु पत्रिकाओं का प्रकाशन हमेशा से कठिन काम रहा है और वर्तमान में तो और भी कठिन हो चुका है। लेकिन फिर भी अभी भी कुछ लोग लघु पत्रिकाएं निकाल ही रहे हैं। आज जबकि सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफार्म बनकर उभरा है जहां आप जो चाहें लिख सकते हैं। वहां किसी तरह का दबाव नहीं है। सोशल मीडिया में लिखने की आजादी तो मिल गई लेकिन गुणवत्ता पर असर पड़ा है। जिसके मन में जो आता है उसे लिख डालता है। ऐसे में एक लंबे समय के लिए साहित्य को संजोये रखने में खासतौर पर वैचारिक स्तर पर लघु पत्रिकाओं की भूमिका और बढ़ गई है। वैसे तो आज के समय में साहित्य का नाम लेते ही एक खास विचार वाले आप पर पिल पड़ेंगे। उससे भी ज्यादा खतरा उनसे है जो गैरराजनीति का नारा देते हैं।
अगर वर्तमान हालात पर नजर डालें तो देश की दशा भी अच्छी नहीं है। हर तरफ असंतोष है, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने जनजीवन को त्रस्त कर रखा है। किसान मजदूर, व्यापारी से लेकर युवा तक हलाकान हैं। लेकिन कोई सुनवाई नहीं है। सरकारी तंत्र प्रताड़ित करने में लगा है तो विपक्ष कूढ़मगजी
का शिकार है। आम आदमी किससे दुखड़ा रोये। पिछले कई सालों से आंदोलन ठप है। छोटे मोटे आंदोलन होते हैं तो वे डंडे के बल पर दबा दिए जाते हैं।
मान लिया गया है कि आंदोलन का असर नहीं होता। लेकिन इधर किसानों के दो आंदोलनों ने दिखा दिया कि अगर एक हो जाएं तो सत्ता को सुनना ही पड़ेगा। राजस्थान और महाराष्ट्र के किसान आंदोलन एक सबक दे गए कि अपनी बात मनवाने के लिए एकजुट होना जरूरी है। इन आंदोलनों को भी इग्नोर करने की भरपूर कोशिश की गई। चूंकि मीडिया सत्ता की गोदी में बैठा हुआ है। मीडिया का चरित्र पूरी तरह बदल गया है। सच तो यह है कि उसे जनमानस की परवाह नहीं रही। वह सरकारी प्रचार का साधन बनकर रह गया है। किसान और श्रमिक या यों कहें कि उनके दुख दर्द से जुड़ी खबरों को उपेक्षा के भाव से ही देखता है।
खैर, पत्रिका पर लौटता हूं। नाम है सामयिक परिदृश्य। इसका छठा अंक कुछ समय पहले प्रकाशित हुआ है। इस पत्रिका को लेकर मेरा विशेष झुकाव इसलिए है कि जब इसका प्रकाशन शुरू किया गया था तो मैं इसके संपादकमंडल से जुड़ा हुआ था। तब मैं कलकत्ता में पढ़ाई कर रहा था। उस समय के सामयिक परिदृष्य के अंकों में विविघ विषयों पर सामग्री प्रकाशित हुई और लोगों ने उन्हें सराहा। काफी लंबे समय के बाद सामयिक परिदृश्य का प्रकाशन हुआ है। लंबे अंतराल के बाद प्रकाशित इस अंक में देश और समाज के सामने मौजूद संकट पर गंभीर विमर्श किया गया है। पिछले कई दशक में खासतौर पर नई आर्थिक नीतियों के बाद के देश दुनिया में आये बदलाव और साहित्य की भूमिका की चर्चा है। इस बदलाव ने पूरी दुनिया को झिंझोड़ कर रख
दिया। इस परिवर्तन का सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है रोजगार पर। देश में लगातार बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। इसके चलते और कई तरह की परेशानियां दिखाई दे रही हैं। जहां मुट्ठी भर लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है तो गरीबों की संख्या तेजी से बढ़ी है। असर यह रहा है कि गरीबों और अमीरों के बीच की खाई दिनोंदिन चौड़ी होती जा रही है। राजनीति का स्वरूप भी तेजी से बदला है, सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने की जगह
राजनीति में असहिष्णुता तेजी से बढ़ी है। अभिव्यक्ति की आजादी पर तरह तरह से अंकुश लगाया जा रहा है। साहित्य भी इससे अछूता नहीं है।
सामयिक परिदृश्य के ताजा अंक में विमल वर्मा अपने संपादकीय (अपनी बात) की शुरुआत काफ्का को उद्धृत करते कहते हैं- काफ्का ने अपनी डायरी में लिखा था - "लक्ष्य है लेकिन रास्ता कोई नहीं। " वे लिखते हैं कि इन पंक्तियों में केवल काफ्का की ही नितान्त निजी अनुभूति नहीं है, इसमें फासिज्म के भयावह आतंक से उपजा बीसवीं सदी का विक्षुब्ध, कातर, निरीह बौद्धिक आर्तनाद है। जिसने सत्ता और मनुष्य की स्वतंत्रता के बीच गहरी विध्वंसात्मक प्रक्रिया द्वारा मानवीय अस्तित्व के उन्मूलन का पैशाचिक अभियान चलाया था। नाजियों ने लोकतंत्र की अस्मिता पर इतना कठोर आघात किया था कि स्वाधीनता और मानवीय मूल्यों के दर्शन ने स्वतंत्रता, समानता, मातृत्व का जो ताना-बाना बुना था, मनुष्य के आत्मविश्वास और विश्व जगत के बीच जो
सेतु बनाया गया था वह भहरा दिया गया। यह ट्रैजिक प्रक्रिया इतनी वीभत्स और दारुण थी कि इसने मनुष्य से उसका गौरव छीन लिया। जेनेवा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर प्रख्यात लेखक जार्ज स्टाइनर ने "लैंग्वेज एंड साइलेंस" नामक पुस्तक में युद्धोत्तर जर्मनी के बारे में लिखा है- "ऊपर से जिंदगी का ऐश्वर्य मुक्त उन्माद दिखता है, लेकिन भीतर एक अपूर्व खामोशी है। सन् 1914 के विश्वयुद्ध के लिए जिस तरह से सैनिकों ने मार्च किया, उसी तरह शब्दों ने भी। जो सैनिक बचकर लौट आए, चार वर्ष तक युद्ध में रहकर, वे सब दबे कुचले पराजित थे। लेकिन सही अर्थों में शब्द नहीं लौटे। वे वहीं फ्रंट पर रह गए।" इस कोट के बाद विमल वर्मा लिखते हैं- यह उद्धरण हम इसलिए दे रहे हैं कि आज हमें वैसी पगध्वनि की आहट की आशंका दिखाई पड़ रही है।
संपादक विमल वर्मा इस तरह से आज के हालात का आंकलन करते हैं। इसी लेख में वे आगे अंग्रेजी कवि डेविड लाज की कविता "यदि कवियों को झंडे रखने चाहिए" को उद्धृत करते हैं-" वे मांगते हैं /अपनी तानाशाही सजाने के लिए /कविताएं/जिनमें अतड़ियां लगे पाताकाएं सी/खून लगे पताकाएं सी/खून लगे शराब सा/मृत्यु लगे नीद सी/वे मांगते हैं/कत्ल हुए लोगों की कब्रों पर छितराने के लिए/मालाएं/दुर्गंध को बहा ले जाने के लिए/महकते शब्दों की कटी पंखुड़ियों वाले /फूलों के गुच्छे/वे चाहते हैं /छन्द के खुदे मकबरे में/गुस्सा दफना दिया जाए/वेदना की चीखों को/काल्पनिक संगीत में भुला दिया जाए/हत्याकांड के नाद को /वाद्यराज (आर्गन) की गूंज में /डुबा दिया जाए/ वे चाहते हैं कवि को बनाना/पिंजरे में गाने वाला एक पक्षी/गायक मंडली का एक हिजड़ा/ कला का दास/जो चांदी की ठनठनाती जंजीरों से /अपनी मनोव्यथा की हथकड़ी पहनाएं/ हम इनकार करते हैं।... "
वे लिखते हैं - याद रखिए वैचारिक केंद्रीयता (Idealogical Centralism) जीवन के सभी पहलुओं के साथ चिंतन की एकरूपता एक चिंतन प्रणाली तथा उद्देश्य की एकता हासिल करने के सचेत संघर्ष के जरिए ही की जा सकती है। यद्यपि हम भी जानते हैं कि यह संघर्ष राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आंदोलनों को संयोजित करके ही किया जा सकता है। परंतु वैचारिक कार्य पद्धति इस बात पर निर्भर करती है कि जिस युग या कालावधि से हम गुजर रहे हैं उसकी आत्मगत और वस्तुगत विशेषताओं को कितने समीचीन तरीके से देखते हैं।
इस अंक में नव उदारवाद और वर्तमान हिंदी कविता शीर्षक से प्रकाशित लेख में आनंद प्रकाश ने कविता के साथ समाज के बदलते मिजाज पर विस्तार से चर्चा की है। " पिछले दो तीन दशकों से ऐसे बदलाव देखने को मिले हैं जिन्होंने हिंदी लेखन के परिदृश्य को निर्णायक रूप से प्रभावित किया है। मसलन मध्यवर्ग पहले भी था, लेकिन आज की नई स्थिति में वह मूल्य विहीनता की तरफ कमोवेश तेजी से बढ़ा है। उसकी प्राथमिकताएं सफलता केंद्रित हुई हैं और वह स्वयं को पूरी तरह आधुनिक मानता है, इस तरह कि उसका आदर्श तकनीकी के इर्द गिर्द घूमती भाषा में पल बढ़ रहा है और वहां मूल्यों की जगह निजी प्रगति ने ले ली है। इस स्थिति में रचना की शक्ल अलग किस्म के मानदंडों से निर्धारित हो रही है। कविता पर नजर डालें तो पाते हैं कि
उसमें शब्द प्रयोगों की बहुतायत है। गौर करें तो पाते हैं कि उसी मध्यवर्ग में जिसकी तरफ ऊपर इशारा है गंभीर हस्तक्षेप मौजूद हैं, अनेक बार उसे देखकर शासक वर्ग भी सकते में आ जाता है। "
असल में आज का युवा वर्ग का निर्माण जिस काल में हुआ उसमें स्कूली ढांचा तहस नहस या परिवर्तित हुआ है।सरकारी स्कूलों की कमजोर व्यवस्था ने मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से को वहां के पाठ्यक्रम, अध्यापन और व्यापक माहौल से बाहर कर दिया। यह प्रक्रिया अस्सी के दशक में शुरू हुई और नब्बे तक आते-आते शिक्षा संरचना में आमूल परिवर्तन आ गया। जो आज 25 साल का लेखक है वह यदि छोटे शहर या फिर कस्बे में पैदा हुआ तो वह प्राइवेट स्कूल से पढ़कर आाय है। इसमें लेखक के परिवार को, उसके मां-बाप को कितनी मशक्कत करनी पड़ी है यह छुपा नहीं है। संबंधित परिवारों द्वारा वहां बाकी के खर्चों में कटौती हुई, कर्ज लेकर पढ़ाया गया है। मूलभूत संसाधनों मसलन घर, जमीन आदि को बेचा -गिरवी रखा गया। लड़कों को प्राथमिकता देकर
लड़कियों को स्कूल से बीच में निकाला गया है या उनकी शिक्षा का परिसीमन हुआ है, आदि-आदि कारक हैं। पचीस वर्ष का लेखक ऐसा वातावरण देख पाया है जिसमें संवाद और दुतरफा झगड़े होते हैं।
नब्बे के दशक की सचाई जिसका ताल्लुक निजीकरण, उदारवाद और तथाकथित मुक्त अर्थव्यवस्था के प्रभावी आगमन से था। नब्बे का दशक सब्ज बाग दिखाने से शुरू हुआ था। उसी से महसूस होता था कि भारतीय अर्थव्यवस्था गहरे संकट की स्थिति में है और विश्व पूंजीवाद को उसे अपने गिरफ्त में लेने का सही अवसर मिल गया है। निजी क्षेत्र के प्रभावी उभार के साथ-साथ शिक्षा महंगी हुई है, उसका स्तर गिरा है और व्यापक जीविका के साधनों में गंभीर कटौती का आलम दिखता है। क्या यह मात्र आर्थिक वातावरण का मसला है या विचार और संस्कृति के सवाल भी इसके अंतर्गत विभिन्न रूपों में उठते-बनते बिगड़ते हैं। यहां आर्थिक अभावों के मद्देनजर सच-झूठ, उपयोगी-अनुपयोगी, गलत सही जैसे जीवन मूल्यों का निर्धारण होता दिखे तो आश्चर्य न होगा। जैसे शिक्षा महंगी हुई तो अध्यापकों की परिभाषा अपने आप बदली है। वे गुरु और ज्ञानार्जन में मददगार साबित होने वाले वरिष्ठ नागरिक न होकर ज्ञान को मात्र बेचने वाले सेल्समैन जैसे नजर आते हैं।
युवा कवियों को जो वातावरण मिला वह तकरीबन ऐसा ही रहा है। उसके शिक्षा की नींव ही दरकी हुई है। वह असमंजस का शिकार है और सच्चाई और स्वप्न की भूलभुलैया में फंसकर रह गया है। आज का कवि उलझा है, वास्तविक जिंदगी के रोजमर्रा के मामूली सवालों से मुखातिब है, और वहीं अपनी वैचारिक भावनात्मक मुश्किलों का प्रभावी हल ढूंढने में लगा है।
डा आनंद प्रकाश अपने लेख में इन मुद्दों, विसंगतियों पर विस्तार से विचार करते हैं। वे सोवियत रूस में समाजवाद के विघटन के असर का भी जायजा लेते हैं कि किस तरह से उसका असर विश्वव्यापी व्यवस्था पर पड़ा। भारत में उसका असर इतना गहरा पड़ा कि भारत का श्रमिक तबका असहाय सा हो गया और पूंजी के निजी क्षेत्र की बन आई। इसके साथ ही लेखक नई कविता, प्रयोगवाद, जीवन दर्शन और चिंतन दर्शन, शास्त्रीय दर्शन आदि पर विस्तार से नजर डालते हैं। पचास-साठ के दशक में वैचारिकता में आए परिवर्तन, विचारधारा का रचना प्रक्रिया पर असर, भाषा शैली आदि के माध्यम से कवियों और उनकी कविताओं के द्वारा कविता में आए बदलावों की चर्चा करते हैं।
" रचनाकार की विचारधारा का उसकी रचना - प्रक्रिया पर क्या असर पड़ता है, इसकी बड़ी दिलचस्प मिसाल शील की कविताएं है। शील की प्रारंभिक रचनाएं छायावादी शैली में हैं, लेकिन मजदूरों के बीच में रहने के कारण आंदोलन की जरूरत के मुताबिक उन्होंने उसी छंद -विधान या 'पैटर्न' को अन्दर से बदला। उन्होंने गीत लिखे, मुक्त छंद नहीं। नरेंद्र शर्मा का भी उदाहरण दिलचस्प है। वे बड़ी तेजी से प्रगतिशील आंदोलन में आए और जिस 'फार्म' में पगे हुए थे, उसे छोड़कर आल्हा छंद में कविता लिखी। रूस पर उन्होंने कविता लिखी। लेकिन रचनाकार किसी आंदोलन से दो तरह से जुड़ता हैः एक तो केवल वैचारिक स्तर पर, दूसरे वैचारिक के साथ-साथ सामाजिक स्थिति या कर्म के स्तर पर भी। शील और नरेंद्र शर्मा दोनों प्रगतिशील आंदोलन से जुड़़े, लेकिन शील जुड़े़ रहे, नरेंद्र शर्मा बाद में उससे अलग होकर दूसरी दिशा में चले गए। इसका कारण यही हो सकता है कि नरेंद्र शर्मा केवल वैचारिक स्तर पर जुड़े थे, जबकि शील सामाजिक स्थिति और कर्म के स्तर पर भी प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े थे। (उद्भावना- 97, 324) इस तरह से लेखक ने विस्तार से कविता में आए बदलावों पर चर्चा की है। समाज में व्याप्त तात्कालिक दबावों, सामाजिक आर्थिक हालात और उसके चलते बदलता वैचारिक परिदृश्य कैसे कविता पर असर डालता है उस पर गंभीर विमर्श करते हैं।
इसी तरह से एक महत्वपूर्ण लेख बाबा नागार्जुन की कविता "हरिजन गाथा" पर "वास्तविक वस्तुनिष्ठता की आत्मपरक संरचना " शीर्षक से परशुराम ने लिखा है। बाबा नागार्जुन का रचनाकर्म बहुत वृहद है। उपन्यास, कविता, कहानी तकरीबन सभी विधाओं में उन्होंने लिखा है। उनको जनकवि का दर्जा हासिल है। वे आम आदमी के पक्षधर हैं। वह व्यवस्था परिवर्तन में जनता की भागीदारी चाहते हैं। वह सामाजिक परिवर्तन और वह भी क्रांतिकारी परिवर्तन के पक्षधर थे। बाबा नागार्जुन जनता की आवाज को स्वर उसी की भाषा में देते हैं। कह सकते हैं कि उनकी कविताएं तात्कालिक टिप्पणी भी हैं। परशुराम लिखते हैं- उनकी कविताएं तात्कालिक समय का केवल बयान ही प्रस्तुत नहीं करतीं बल्कि उसमें हस्तक्षेप भी करती हैं। ताकि सामाजिक रूपांतरण में
व्यापक जनसमुदाय परिवर्तन के लिए संकल्पित हो सकें। इस प्रकार उनकी कविताओं में कलात्मक संवेदना और सामाजिक संवेदना घुल मिलकर गहरा प्रभाव डालती हैं। नागार्जुन की राजनीतिक कविताओं के बारे में उनका कहना है... किंतु जनता के संघर्षों में सहभागिता, सजग आत्म-दृष्टि, जनपक्षधरता और
आलोचनात्मक विवेक के चलते उस खाई से निकले भी। बावजूद इसके यह भी सच है कि कभी भी उन्होंने लोक-तंत्र के हिंसकों से कोई समझौता नहीं किया।राज्य सत्ता के विरुद्ध जनता के संघर्षों में उनका सकर्मक समर्थन रहा। कविता में भी और कभी-कभी व्यक्ति के धरातल पर भी।
बाबा नागार्जुन केवल कविताएं लिखते भर नहीं थे बल्कि उस जीवन को जीते भी थे। उनके जीवन पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है। परशुराम जी लिखते हैं- नागार्जुन के लिए लिखना भी एक राजनीतिक कर्म था और जीना भी। वह ' घर' में घुसकर लिखने वाले कवि नहीं थे। वह कबीर और निराला की परम्परा के कवि थे। उन्होंने ' विषकीट ' में लिखा भी है कि कबीर से मैंने दो टूक अख्खड़पन लिया और निराला से स्वाभिमान का संस्कार।'
नागार्जुन के समूच सामाजिक राजनीतिक सामाजिक बोध और अनुभव के निचोड़ को हम इन पंक्तियों में देख सकते हैं- हरिजन गाथा की पंक्तियों को देखिए- 'दिल ने कहा - दलित मांओं के/सब बच्चे अब बागी होंगे /अग्निपुत्र होंगे वे अंतिम /विप्लव के सहभागी होंगे।... इसकी अपनी पार्टी होगी /इसका अपना ही दल होगा /जनबल धनबल सभी जुटेगा /हथियारों की कमी न होगी।' वहीं दूसरी तरफ लिखते हैं- हिंसा और अहिंसा दोनों /बहने इनको प्यार करेंगी। ' लेखक के शब्दों में कहें कि ' हरिजन- गाथा' नागार्जुन की ' सहानुभूति' की नहीं बल्कि 'स्वानुभूति' की कविता है क्योंकि यह कविता प्रत्यक्ष अनुभव प्रकरणों और तंतुओं से बंधी है। यह वर्चस्ववादी संस्कृति के विरुद्ध एक नई संस्कृति के सृजन की ओर संकेत करते हैं। एक ऐसी संस्कृति जिसका आधार लोकतंत्र हो और हाशिये पर फेंक दिए गए लोगों को सम्मानित स्थान दे तथा सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका स्वीकार करे। आज देश में जो जन विरोधी, दलित विरोधी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति चल रही है, उसमें यह कविता हस्तक्षेप करती है।'
परशुराम जी की इस लेख में बाबा नागार्जुन के व्यक्तित्व और कृतित्व के हर पहलू पर नजर डाली गई है। हरिजन-गाथा के बहाने लेखक नागार्जुन के कवि पक्ष के साथ साथ उनकी राजनीतिक वैचारिक सोच, जन आंदोलनों से कविता और खुद कवि का जुड़ाव और उसका असर, लेखन का जीवन पर और जीवन का लेखन पर असर, समाज की विसंगतियां और उससे संघर्ष पर बड़ी बारीकी से विचार करता है। यह लेख नागार्जुन के संबंध में एक धरोहर जैसा है।
बोलना बहुत जरूरी है
आज देश में जन-विरोधी, दलित विरोधी और राजनीतिक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति चल रही है। पूंजी का स्वरूप बदल चुका है। वह भूमंडलीकृत हो चुकी है। किंतु समाज में राजनीतिक सांस्कृतिक दमन उग्र रूप धारण कर चुका है। इसके साथ ही असहिष्णुता चरम पर है। सामाजिक असमानताएं और विषमताएं अतिरेक में हैं। समाज का एक बड़ा तबका इन बुराइयों से परेशान है। लेकिन इनके खिलाफ एकजुटता का वातावरण तैयार नहीं हो पा रहा है जिसके कारण वे पराजय और निराशा-बोध के कानन में भटक रहे हैं।
सामयिक परिदृश्य के यह अंक में साहित्य के साथ साथ उन सभी सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की गई है जो समाज को परेशान किए हुए हैं। पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं की विशेषता भी यही है कि वे मनुष्य के सामने आने वाली दिक्कतों और परेशानियों के सवालों से बार बार टकराती हैं और एक दिशा देने की कोशिश करती हैं।
वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा का गीत 'मौकापरस्तों का सहगान' और श्रीहर्ष की कविता 'रंगों की टकराहट' ध्यान खींचती है। विष्णुचंद्र शर्मा अपनी कविता में मौका परस्तों की जबरदस्त तरीके से लानत मलानत करते हैं। अपनी कविता में वह राजनेताओं, साहित्यकारों, नौकरशाहों सभी पर व्यंग्य करते हैं, सबकी खबर लेते हैं। कविता का शीर्षक 'मौकापरस्तों का सहगान' पढ़ते ही पाठक के जेहन में यह बात आ जाती है कि किसी न किसी उस व्यक्तित्व का चित्रण कविता में होगा जो मौके के अनुरूप खुद को बदलकर लाभ उठाने में आगे रहते हैं। गीत है- 'बड़े सेठ का जूता खाओ हर गंगे।' आज के दौर में जब पैसा ही परम सत्य बनकर रह गया है और हर व्यक्ति येनकेन प्रकारेण उसके चक्कर में लगा हुआ है। जहां मनुष्य की योग्यता उसके ज्ञान से नहीं, बाहरी चमक दमक से आंकी जा रही है। ऐसे में पूंजीपति/सेठ ही लोगों के भगवान बन गए हैं। सेठों के दरबार में विद्वानों की जगह किस काम की। ऐसे हालात में पैसा और तरक्की का एकमात्र साधन सेठ की कृपादृष्टि ही बचती है। और सेठों के राज में वही सफल हैं जो सेठों का जूता उठाने और खाने के लिए तैयार हैं। अगली पंक्तियों पर गौर करें- 'मारे अमरीका तो गाओ हर गंगे/नेता कहे वही दुहराओ हर गंगे' अब देखिये अमरीका क्या है, साम्राज्यवाद का
प्रतीक अगुवा। वह जो कह रहा है वही सही है। अपने आधिपत्य के लिए वह दुनिया भर के देशों को बर्बाद कर रहा है। जिसने भी उसकी बात मानने से इनकार किया या उसके फायदे में रोड़ा बनने की कोशिश की उसे नेस्तनाबूद कर दिया। इराक, अफगानिस्तान आदि राष्ट्र उसकी बात न मानने की सजा भुगत रहे हैं। नया निशाना उत्तर कोरिया है। कितने दिनों तक वह बचा रहता है। अमेरिका के विरोध में आज कोई बोलने की स्थिति में नहीं है। उसकी नीतियों की नकल में सारी दुनिया लगी हुई है, किसी को जनता के अच्छे भले की परवाह नहीं है। अमेरिका साम्राज्यवाद का अगुवा है। साम्राज्यवाद का चरित्र है उसकी हां में हां मिलाओ नहीं तो बचोगे नहीं। इसी तरह कविता में विष्णुचंद्र शर्मा राजनेताओं, कवियों सबको नंगा करते हैं।
श्रीहर्ष की कविता 'रंगों की टकराहट' कविता आकार में छोटी है परंतु विस्तृत फलक समेटे हुए है। रंगों को प्रतीक बनाकर लिखी गई यह कविता वर्तमान समय की राजनीति और सत्ता के चरित्र को बेनकाब करती है। कविता की शुरुआत है.. रंगों की आपसी टकराहट/ कैनवास पर उभरने लगी है/ भीतर का द्वन्द-रेखाओं के/ टेढेपन में बोलने लगा है/ चमक-आकर्षण पर धुंध फैलने लगी है। इसे वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो सभी राजनीतिक दलों की पहचान उनके चुनाव चिह्नों के साथ उसके रंगों से होती है। भाजपा की पहचान भगवा रंग से है तो समाजवादी पार्टी की पहचान रहें और बसपा की पहचान नीले रंग से है। कम्युनिस्टों की पहचान लाल रंग से की जाती है। इसके साथ ही रंग को शासक और आम जनता के प्रतीक के तौर पर देखें तो कवि का कहना है कि कैनवास पर शासक वर्ग और जनता के बीच का टकराव दिखाई पड़ने लगा है। जनता को सत्ता महत्व देती नहीं है। उनकी नजर में जनता का कोई मूल्य नहीं है। जनता और सत्ता के बीच द्वंद मुखर होने लगा है। लोक लुभावने और बड़े- बड़े वादे करके सत्ता हासिल करने के बाद जब पोल खुलती है और जनता की मुसीबतें ज्यादा बढ़ जाती हैं तो जहां उसके दिमाग से सरकार और उनके नेताओं के प्रति रोष भाव बढ़ता है वहीं सत्ताधारी नेताओं के चेहरे पर जनता में बढ़ती बेचैनी और रोष से तनाव आ जाता है और असलियत सामने आने पर जो चमक आकर्षण है उस पर धुंध फैलने लगी है।
कविता की अगली पंक्तियां हैं- 'सफेद के नीचे छिपे काले दाग/ उभरकर सामने आ गये हैं/ काला रंग टोपी पहन-जूते बजा / आतंक फैला रहा है/ पीले के उफनते गुस्से ने चेहरों को/ पीलाकर दिया है/ लाल रंग घायल होकर -अंधेरे में / खुसर फुसर कर रहा है / नीला हरा अपनी जगह की तलाश में भटक रहे हैं/ रंगों की टकराहट बढ़ती जा रही है / कैनवास मौन ताक रहा है।'
झूठ और फरेब के दम पर दुनिया में मायावी सपने दिखाकर जनता को कितने दिनों तक धोखा दिया /बहकाया जा सकता है। हकीकत ज्यादा दिन छिपती नहीं। चुनाव में बड़े बड़े वायदे कर सत्ता हासिल करने के बाद जब वादे पूरे नहीं होते तो जनता नेताओं के काले चेहरों को पहचान लेती है। बहुमत के चमक का आकर्षण फीका पड़ने लगा है। मुखौटा हट जाने पर जहां जनता नेताओं के प्रति गुस्से में है तो नेता असलियत का पर्दाफाश होने से जनता से नाराज है। उसका परिणाम यह होता है कि जगह जगह जनता सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरती है और सत्ता के निर्देश पर जनता का पुलिसिया दमन शुरू हो जाता है। लोगों के हक की लड़ाई करने वाले लाल रंग भी बेदम हो चुका है, उसके नेता और कार्यकर्ता भी अंधेरे में भटक रहे हैं या भटकाव के शिकार हैं।
नीले और हरे रंग वाली पार्टियों के नेता अपनी अपनी जगह तल ाशने में लगे हुए हैं। जनता मौन होकर राजनीतिक दलों के तमाशे देख रही है।
वैसे तो भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की अपनी परिभाषा है। लेकिन जब वह सत्ता में होती है तो उस पर बहस तेज हो जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के समय से ही राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को हिंदू धर्म से जोड़कर बांटने की साजिश रचता आ रहा है। इस वर्चस्वकी लड़ाई के लिए मुसलमान और ईसाई हमेशा उसके निशाने पर रहे हैं। उसकी जब भी सरकार बनी है तो सांप्रदायिकता की तपिश तेज हुई है। पिछले समय में चूंकि भाजपा कभी अपने बूते बहुमत की सरकार केंद्र में नहीं बना पाई थी इसलिए ज्यादा आक्रामक नहीं रही। लेकिन पिछले आम चुनाव में उसे भारी बहुमत मिला तो अपना एजेंडा पूरा करने में उसे आसानी हो गईं। आरएसएस के हिंदुत्व के एजेंडे को खुले रूप में परवान चढ़ाया जा रहा है। उसके कार्यकर्ता जगह-जगह अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। आम जनता से लेकर उनकी विचारधारा की मुखालफत करने वाले बुद्धिजीवियों, साहित्यकार, पत्रकार वर्ग भी उनके निशाने पर है और उनकी हत्या की जा रही है। पनसारे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या कर दी जाती है और इन हत्याओं की भर्त्सना करने वाले उनके निशाने पर होते हैं। उनके समर्थक जगह जगह दलितों को निशाना बनाते हैं। किसी न किसी तरह विश्वविद्यालय उनके निशाने पर हैं। जहां उनका असर नहीं है वहां अकादमिक व्यवस्था को नष्ट किया जा रहा है। विश्वविद्यालयों में छात्रों और टीचरों पर न सिर्फ हमले हो रहे हैं बल्कि ग्रांट रोक कर या कुलपतियों के सहारे वहां के पठन पाठन में अवरोध पैदा किया जा रहा है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय खासतौर पर उनके निशाने पर रहा है।
महत्वपूर्ण यह लोकतंत्र के लिए खतरा है और वर्तमान में यह खतरा लगातार बना हुआ है। सामयिक परिदृश्य में प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर और अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक के लेख राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता पर हैं। रोमिला थापर अपने लेख 'धर्म -आधारित राष्ट्रवाद पूरे जोर शोर से वापस आ गया है ' में प्रचारित किए जा रहे राष्ट्रवाद की पड़ताल करती हैं। वे लिखती हैं कि - 'एक ऐसे समाज में कार्यशील लोकतंत्र की स्थापना करना मुश्किल है, जहां पर विशेषाधिकार प्राप्त और वंचित समूहों की विशेष श्रेणियां, घटते - बढ़ते अधिकारों के साथ धार्मिक पहचानों पर आधारित बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक समुदाय; और ऐसी विचारधारा है जो द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन करती है, जहां पर धर्म, जाति और भाषा पहचान बन जाती है। यह मुश्किल इसलिए है
कि लोकतंत्र के लिए इसे उलट देने की जरूरत होती है- इसका अर्थ सभी के लिए समान अधिकार और सभी नागरिकों पर लागू कानूनों मं समानता है।' वे सवाल करती हैं- क्या धार्मिक एवं सांस्कृतिक अतिवाद की विचारधाराएं निरपवाद रूप से पहले के उपनिवेश के समाज और संस्कृति की व्याख्याओं से उत्पन्न हुई हैं, जैसा कि उपनिवेशवादियों द्वारा निर्मित किया गया है? दूसरे शब्दों में क्या हमें उन पहचानों को समर्थन देना होगा जिन्हें ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने हमारे ऊपर थोपा था ? क्या हम इसके बजाय इन पहचानों पर सावल नहीं उठा सकते और विकल्पों पर विचार नहीं कर सकते। इस तरह की पहचानों की निरंतरता अंतर्निहित रूप से लोकतंत्र विरोधी है। वे उपनिवेश चाहते थे न कि स्वतंत्र लोकतंत्र।'
सांप्रदायिकता क्यों फैल रही है इसके कारणों और समाधान कैसे किया जा सकता है, इस पर विचार करते हुए रोमिला लिखती हैं- सांप्रदायिकता अंततः इस मान्यता पर आधारित लोगों के मध्य की ऐसी विचार-पद्धति है कि उन्हें अपने आकाओं के द्वारा जो कुछ भी बताया गया है, उन्हें बस उतना ही जानना चाहिए। यह बेहतर चीज को जानने की अनिच्छा को दर्शाता है। अतएव एकमात्र धार्मिक समुदायों 'फिर चाहे बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक' का अंततः सीमित उद्देश्य होता है। यह साम्प्रदायिकता का खात्मा नहीं करेगा।
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि हमें ऐसे अन्य तरीकों के बारे में सोचना होगा, जिनके द्वारा पहचानें विकसित की गयी हैं। ऐसा जान पड़ता है कि हम उस बिंदु पर पहुंच गए हैं जबकि सांप्रदायिक विचारों एवं गतिविधियों को वैध राष्ट्रवाद के रूप में लिया जाता है। हमें राष्ट्रवाद को सांप्रदायिकता से अलग करना होगा। किसी भी समूह के पास यह दावा करन का एकाधिकार नहीं है कि केवल उसकी ही गतिविधियों से राष्ट्रवाद का निर्माण होता है और दूसरे सभी राष्ट्रविरोधी हैं। हमें समावेशी, धर्मनिरपेक्ष अंदाज में राष्ट्रवाद को पुनः निर्मित करना है, जिससे प्रत्येक भारतीय को बराबर मात्रा में और समान अधिकारों के साथ भागीदारी करने का अवसर प्राप्त हो।'
प्रभात पटनायक अपने लेख 'राष्ट्रीय' होने का अर्थ क्या है? में बताते हैं कि राष्ट्रीय, राष्ट्रीयता तथा राष्ट्र राज्य की शब्दावली 17 वीं शताब्दी में वेस्ट फाइनेंसियल पीस ट्रिटी के बाद प्रचलन में आई थी। लेकिन यूरोपियन राष्ट्रवाद की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं- पहली- इसमें पूरी आबादी एक ही राष्ट्र का भूभाग होने के बावजूद नहीं आती है। इसमें हमेशा अपने भीतर ही शत्रु ( उदाहरण के लिए यहूदी) होते थे। दूसरे, पूरी तरह से औपनिवेशिक था। वेस्ट फेलियन ट्रीटीज के एक महीने के अंदर -अंदर ओलिवर कामवेल ने आयरलैंड पर हमला किया (जो कि जीता हुआ पहला उपनिवेश था) तथा इंग्लैंड ने पूरे भू क्षेत्र पर अपना कब्जा जमा लिया था। तीसरे, राष्ट्र अपनी महिमा स्वयं गाते रहे। इसके पीछे कारण था राष्ट्र को मजबूत बनाना। यह कोई व्यापारिक धारणा नहीं थी; जैसा कि आमतौर पर माना जाता है। यह शास्त्रीय राजनीतिक अर्थशास्त्र का आधार भी है।
---- जब गांधी जी ने अपने अंतिम दिनों में विभाजन की विभीषिका के खिलाफ तथा कांग्रेसे नेताओं के लाख विरोध के बावजूद पाकिस्तान को पावना देने पर जोर दिया तो यह राष्ट्रविरोधी नहीं था, वे सिर्फ जनतांत्रिक राष्ट्रवाद को स्वीकृति दे रहे थे। आजादी की लड़ाई को ध्यान में रखते हुए उनका यह कार्य सही था। इसके केंद्र में सहन शक्ति, संरक्षण, समझौता का - मतभेद के लिए शक्ति प्रदर्शन नहीं था, अपना दबदबा दिखाना भी नहीं था। इस राष्ट्रवाद की मांग है कि अगर देश में कहीं राष्ट्रविरोधी नारे लगते हैं तो चूंकि उनमें आतंकवादी हिंसा या भड़काऊपन नहीं है तो यह समय आत्ममंथन का, विश्लेषण का है ताकि आपसी विरोध दूर हों न कि उन पर षड्यंत्र करने का उपनिवेशी कानून लागू किया जाए जैसा कि आज हो रहा है।
पटनायक इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि आक्रामक राष्ट्रवाद के प्रति झुकाव भी देश में खासतौर पर नई उदारवादी नीतियों के चलते ही आया। भाजपा इसका पूरा समर्थन करती रही है। ... लेकिन भारत को एक राष्ट्र बनाने के लिए ये हानिकारक रुख है।
पत्रिका की एक महत्वपूर्ण धरोहर फिल्मकार ऋत्विक घटका का साक्षात्कार है। यह साक्षात्कार बांग्ला की चित्रवीक्षण पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। किसने इस इंटरव्यू को लिया और कब लिया अनुवादक ने यह जानकारी नहीं दी है। इसका अनुवाद किया है कमलेश पांडेय ने । लेकिन इस इंटरव्यू में ऋत्विक घटक बहुत खुलकर सिनेमा में दर्शन, प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक परम्परा के संबंध में दृष्टिकोण, सिनेमा संबंधित आदर्शवादी पृष्ठभूमि और कलाकारों की आजादी के प्रसंघ, जुंग के अनकांसेसनेस तत्व (समेकित अवचेतन), वर्गीय कला संस्कृति, मदर काम्पलेक्स जैसे सवालों का खुलकर जवाब देते हैं तथा सामाजिक द्वंद्वों का मार्क्सवादी विश्वेषण करते हैं। इसके साथ ही वे अपनी सभी फिल्मों, उनके पात्रों, उनकी रचना के विषय वस्तु पर अपनी बात कहते हैं। चरित्रों की विसंगतियों से संबंधित एक सवाल के जवाब में ऋत्विक 'युक्ति तक्को आर गल्पो' का सांवली के चरित्र के बारे में वे कहते हैं कि सांवली का चरित्र कोई वास्तविक चरित्र नहीं है, किन्तु किसी भी वास्तविक पात्र के साथ उसकी एकरूपता मानों अटूट है। ... इसके साथ ही मैंने इस चरित्र के जरिये पूरे बांग्लादेश को उजागर करने की कोशिश की है। अपने देश की फिल्मों में हमेशा बंगाली लड़कियों को नखरे दिखाते, खुश मिजाज, पवित्र दिखाया जाता है, लेकिन बंगाली लड़िकयां वही भर नहीं हैं। इसलिए मैंने एक सशक्त लड़की का चरित्र गढ़ा है और उसके जरिये पूरे देश की आत्मा को दर्शाने की एक कोशिश की है। मूल बात यह है कि सभी फिल्मों में किसी चरित्र के माध्यम से मैं किसी न किसी विचारधारा को व्यक्त करने की कोशिश करता हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं इस दुनिया के बाहर का कुछ करता हूं।
उनकी फिल्मों में पुराण, मिथक तथा आधुनिक जीवन के घुलमिल जाने संबंधी एक प्रश्न के उत्तर में ऋत्विक कहते हैं- मुझे सबसे अधिक भारतीय प्राचीन परम्परा, उसमें ऋग्वेद से शुरू कर संहिताएं ब्राह्मण, आरण्यक, श्रुतियों के सभी अंश, उपनिषद, स्मृति, पुराण एवं महाकाव्य आकृष्ट करते हैं। ... प्राचीन ऋषि मुनि या इन्हें जो कुछ भी कहा जाए, वे लोग जो भी थे, उन्होंने कितनी गंभीरता से मानवीय मनोविज्ञान का विश्वलेषण किया था। .. उन सबको एक बार फिर सामने लाने की आवश्यकता है- सामने लाकर उन सबको वर्तमान जगत से मौजू करना होगा, यह पहली प्राथमिकता है। ... अपने देश की धड़कन के साथ संबंध कायम रखने की नितांत आवश्यकता है। अपने देश की जनता को उससे काफी जल्द हम आश्वस्त कर सकते हैं, बहुत जल्द उनके दिल जीत सकते हैं।
इसके अलावा इस अंक में व्यवस्था-सत्ता - पुरस्कार में डॊ कर्ण सिंह चौहान ने साहित्यकारों, कलाकारों पर लगातार हमलों और हत्या को लेकर असहिष्णुता के विरोध में देश भर में लेखकों, कवियों और कलाकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने के मुद्दे पर टिप्पणी लिखी है। उनका कहना हे कि सरकार या सरकारी प्रतिष्ठानों से पुरस्कार लिए ही नहीं जाने चाहिए। राजेश्वर सक्सेना न कारपोरेट संस्कृति का विमर्श में समुदाय और भीड़ की अवधारणा के नये युग में एक नये तरह के समाज के नये परिदृश्य के विकास पर रोशनी डाली है। मनीष कुमार 'कृषि संकट और कृषक आत्महत्या' लेख में खेती और किसानों की दुर्दशा पर विचार किया है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक धीरेंन्द्र नाथ गंगोपाध्याय के लेख ' फासीवाद की दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि ' में फासीवाद क्या है और कैसे विकसित हुआ है। और फासीवाद का समाज पर असर क्या पड़ा इस पर गंभीरता से चरचा की है।
इसी तरह इस अंक में कुशेश्वर, संतोष चतुर्वेदी की कविताएं भी पठनीय हैं।
संपादक- विमल वर्मा, श्री हर्ष
प्रकाशक- दया शंकर अष्ठाना
संपर्क- एच-13, एल .आई.जी. एस्टेट
8/1 रुस्तमजी पारसी रोड
काशीपुर, कोलकाता- 700002
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