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भाषा का समाजशास्त्र


- शक्ति वर्मा 

हिंदी में भाषा को लेकर बड़ा विवाद रहा है कि साहित्य की भाषा कैसी होनी चाहिएकुछ लोगों की राय रही है कि संस्कृतनिष्ठ हिंदी ही साहित्य की भाषा होनी चाहिए तो कुछ लोग हिंदी-उर्दू मिश्रित हिंदवी को साहित्य की भाषा रखने पर जोर देते रहे। कई विद्वान ऐसे भी रहे जो हिंदी में किसी अन्य भाषा का शब्द रखने के कट्टर विरोधी रहे। यही नहींसाहित्य और बोलचाल की भाषा एक होनी चाहिए या विशिष्ट इस पर भी लंबी बहस चली है।
भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। दूसरों तक अपनी बात पहुंचाने का माध्यम ताकि आप जो कह रहे हैं वह उसे सही तरीके से समझ सकें। इसमें सारा खेल शब्दों का है। अपनी बात बताने के लिए जिन शब्दों का चयन किया गया है क्या उसे दूसरा समझता है। भाषा के विकास में लंबा समय लगता है। उसके बननेरचने में समय और समाज का महत्वपूर्ण योगदान होता है। एक लंबी कालावधि में तमाम रास्तों से गुजर कर एक सटीक शब्द हासिल होता है। पहले उसका उपयोग विभिन्न नामों से होता है और फिर एक दिन एक सही शब्द का चयन होता है जो भाषा को समृद्ध करता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘ भाषासाहित्य और समाज विमर्श’ नामक लेख में लिखा है, जिस भाषा में शब्दों की कमी है उसका प्रभाव मनुष्य के कार्यकलाप पर बहुत थोड़ा है। उस भाषा का बोलनेवाला बहुत सी बातों को जानता हुआ भी अनजान बना रहता है। यद्यपि शब्दों की बहुतायत से भाषा की पुष्टि होती है तथापि कई बातें ऐसी हैं जो उसकी सीमा स्थिर करती हैं।
आलोच्य पुस्तक भाषा का समाजशास्त्र में सुभाष शर्मा ने भाषा के सैद्धांतिक और व्यवहारिक स्वरूप पर विचार किया है। सुभाष शर्मा समाजशास्त्री हैं। उन्होंने अपनी इस पुस्तक में भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। भूमिका में वे लिखते हैं- इस पुस्तक का उद्देश्य है कि कतिपय भाषा वैज्ञानिक सिद्धांतों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाए। भाषा के विकास के बारे में वे लिखते हैं- भाषा एक लंबी अवधि कई पीढ़ियों के कुछ व्यक्तियों के द्वारा कुछ शब्दों के समान अर्थ मानने से विकसित होती है यानी कोई भाषा किसी समाज में बनती  बिगड़ती  बदलती रहती है। एक ही शब्द को जब कोई एक व्यक्ति या नेक व्यक्ति विभिन्न तरीकों से कहते हैं तो उसके भाव बदल जाते हैं। कभी आदरकभी तिरस्कार या कभी औपचारिक मात्र।

लेकिन भाषा का इतिहास आसान नहीं है। मानव के विकास के साथ-साथ भाषा का भी विकास हुआ। भाषा के विकास का इतिहास  बड़ा रोचक है। चित्रलिपि लिखने की सबसे पुरानी पद्धति है और उसकी खोज सबसे पहले 3000 ई.पू. में मिस्र और मेसोपोटामिया में हुई। बाद में 1500 ई.पू. में चीन में चित्रलिपि प्रचलित हुई। मिस्र की चित्रलिपि को प्रतीकात्मक चित्रलिपि कहा गया ( जिस नाम की उत्पत्ति यूनानी पवित्र नक्काशी से हुई )। क्योंकि इसका उपयोग मंदिरोंमकबरों और अन्य विशिष्ट स्थलों पर किया गया। मगर यही शब्द दूसरी संस्कृतियों की लिपियों यथा सिन्धु घाटी की सभ्यताभाषा सभ्यता आदि के लिए भी प्रयुक्त किया गया। मिस्र में प्रतीकात्मक चित्रलिपि दाहिनी से बायीं ओर लिखी गई मगर कुछ भऴनों की पंक्तियों के पीछे बर्तुलाकार पंक्तियां भी पाई जाती हैं। चित्रलिपि पद्धित के बाद भावसूचक पद्धति विकसित हुई । चतुर्थ सहस्राब्दी में कीलाक्षर लेखन पद्धति मौजूद थी।
इसके पश्चात बोली के रूप में भाषा का विकास हुआ। लोग संकेतों के माध्यम से आगे बढ़कर बोली के माध्यम से अपनी बात कहने लगे।
भाषा के विस्तार के दायरा आगे बढ़ा तो वह ज्यादा वैज्ञानिक हो गई। सुभाष शर्मा ने लिखा है कि भाषा निष्क्रिय रूप से यथार्थ का प्रतिबिम्बन नहीं करतीबल्कि वह यथार्थ को सक्रिय रूप से सृजित करती है। व्याकरण एवं शब्द भंडार अनुभवों को आकार देते हैं और हमारे प्रत्यक्षबोध (परसेप्शन) को खास अर्थो में बदलते हैं। ... इस प्रकार व्याकरण मानव अनुभव का सिद्धांत और सामाजिक कर्म का सिद्धांत दोनों है। इन दोनों प्रकार्यों में व्याकरण ऐसी संभावना सृजित करता है जिसके भीतर हम काम करते हैं और अपने सांस्कृतिक अस्तित्व को निर्मित करते हैं।
हिन्दी भाषा में भी व्यक्ति शब्द स्त्री-पुरुष दोनों के लिए प्रयुक्त होता है जैसे अंग्रेजी में परसन(person)। हिन्दी भाषा में विभिन्न पदों के लिए स्त्री-पुरुष में भेद किये बिना समान शब्द प्रयुक्त होता है; जैसे अध्यक्षमंत्रीनेताकार्यकर्ता आदि किन्तु कुछ लोग अति उत्साह में क्रमशः अध्यक्षामंत्राणीनेत्री और कार्यकर्त्री शब्दों का गलत इस्तेमाल करते हैं। मगर ज्यादा चिंता का विषय यह है कि आजकल हिन्दी पर अंग्रेजी का वर्चस्व इस कदर छाया हुआ है कि पढ़े-लिखे लोग न केवल अंग्रेजी संज्ञाओं का बल्कि अंग्रेजी क्रियाओं का भी बहुतायत प्रयोग कर रहे हैं। अब महानगरों से शहरों-कस्बों और गांवों तक मां या माता की जगह मम्मी या मॊमपिता या बाबूजी की जगह पापा या डैडी या डैडचाचा या काका की जगह अंकलचाची या काकी की जगह आंटी का खूब प्रचलन हो गया है जिससे सम्बन्धों में औपचारिकता और दिखावापन ज्यादा हावी है। फिर हमारे यहां चाचामामाफूफा विभिन्न रिश्तों (क्रमशः पिता के भाईमां के भाई और बुआ के पति) को सूचित करते हैं जबिक अंग्रेजी में इन तीनों के लिए एक ही शब्द है अंकलअर्थात शब्द -सम्पदा में ज्यादा समृद्ध होते हुए भी हिन्दीअंग्रेजी की दासी या पिछलग्गू बनी हुई है। 
लेकिन मुझे लगता है कि सुभाष शर्मा जायज नहीं है। हम अपनी विरासत को संरक्षित तो करें लेकिन किसी की पसंद का तिरस्कार न करें। हमें उन शब्दों के उपयोग पर बंदिश नहीं लगानी चाहिए जो लोगों के लिए आसान हों। उनको ग्रहण कर लेने से हमारी समझ का दायरा बढ़ेगा बल्कि भाषा भी मजबूत होगी। हिंदी ने ऐसे बहुत से शब्द अपनाएं हैं जो दूसरी भाषाओं से आए थे। इससे हमारा शब्दकोष समृद्ध ही होगा। 13वीं शताब्दी के कवि और शायर अमीर खुसरो ने खुद को हिंदवी का शायर कहा। उन्होंने उस जमाने में लिखा जब हिंदी भाषा का अस्तित्व नहीं था। उन्होंने हिंदीहिंदवी और पारसी में एक साथ लिखा। उनको खड़ी बोली के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है जब खड़ी बोली अस्तित्व में भी नहीं आई थी।
 असल में भाषा के विकास में समय और समाज बहुत मायने रखता है। - भाषा की पारिस्थितिकी अध्याय में सुभाष शर्मा ने लिखा है- पश्चिमी नवजागरण एक प्रगतिशील क्रांति थी और सारे महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने विस्तृत यात्राएं की थीचार  पांच भाषाएं सीखी थीं और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में एक साथ अपना योगदान दिया था। जैसे लियोनार्दो द विंची महान  चित्रकार के अलावा महान गणितज्ञ एवं महान इंजीनियर भी थे। अलबर्ख द्यूर चित्रकारनक्काशवास्तुकार तथा मूर्तिकार थे। मैकियावली राजनीतिशास्त्रीइतिहासकारकवि और सैनिक साहित्य के प्रथम महत्वपूर्ण लेखक थे। लूथर ने चर्च की जड़ परम्पराओं और जर्मन भाषा की जड़ता को साफ किया। इस प्रकार अधिकतर बुद्धिजीवी संघर्ष में भी भाग लेते थे। अतः चरित्र की संपूर्णता और दृढ़ता उऩ्हें मुकम्मल इंसान बनाती थी। किन्तु औद्योगिक क्रांति और भूमंडलीकरण ने पारिस्थितिकी और भाषाओं का अहित भी किया है।
लेखक की चिंता का एक दूसरा पहलू भी है। वैश्वीकरण के चलते लोग अपनी भाषाओं से मुंह मोड़ रहे हैं। भाषाएं लुप्त हो रही हैं। 1999 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व की 96 प्रतिशत भाषाओं को बोलने वाले मात्र 4 प्रतिशत लोग हैं। समर इंस्टीट्यूट आफ लिंग्विस्टिक (1999) ने विश्व की कुल 6784 भाषाओं की गणना की जिसमें से 6060 भाषाओं के ही आंकड़े उपलब्ध पाये गये। इऩमें 51 भाषाओं को बोलने वाले मात्र एक-एक भाषाओं को बोलने वाला मात्र एक-एक व्यक्ति ही बचा था। 

इनमें 28 भाषाएं आस्ट्रेलिया में थीं। फिर विश्व की 500 भाषाओं को बोलने वालों की 
संख्या 1000 (प्रत्येक) से कम थी और 5000 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या एक लाख (प्रत्येक) से कम थी।

पुस्तक का नाम- भाषा का समाजशास्त्र
लेखक- सुभाष शर्मा
प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ
18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोधी रोड, दिल्ली-32
मूल्य- 470 रुपये 

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