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तीसरा आदमी कौन है

- परशुराम  हम अभी कठिन और भयानक समय से गुजर रहे हैं। वैसे पहले भी देश की भौतिक और राजनीतिक परिस्थितियों तकरीबन ऐसी ही थीं किन्तु अभी हमारी निजी अस्मिता भी दांव पर लगी है। मीडिया सरकारी मौर्चा और प्रवक्ता बन गया है।  प्रायः सभी राजनीतिक पार्टियां कमोवेश पीआर एजेंसी की सेवाएं लेकर मुख्यधारा मीडिया में अपने लिए जगह सुनिश्चित करने में लगी हैं। इसमें बाजार तंत्र की प्रमुख भूमिका है। मीडिया के ऊपर भी एक सत्ता है जिसे साधे बिना राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से खबर का हिस्सा नहीं बना जा सकता। इसे सभी जानते हैं। सिद्धांत के स्तर पर सही किन्तु अपने व्यवहार और अनुभव के आधार पर प्रायः सभी लोग मित्र हैं, विशेषकर वे यानी मध्यम वर्ग जो इन्हें देखता है और प्रभावित भी होता है।   मैं कुछ दूसरी बात करना चाहता हूं। मैं हिन्दी के एक महत्वपूर्ण, चर्चित और लोकप्रिय कव‌ि धूमिल की कविता के माध्यम से अपनी बात रखना चाहूंगा। धूमिल साठ के दशक के कवि हैं। रचना रचनाकार की संवेदनशीलता, कल्पनाशीलता और सृजनशीलता का फल है। मैं उनकी रचना के माध्यम से अपनी बात इसलिए रखना चाहता हूं कि साठ-सत्तर...

मानव संबंधों की कहानियां

आलोक वर्मा यह भूमंडलीकरण का युग है। इसके प्रवेश के साथ-साथ अभूतपूर्व सांस्कृतिक संकट आया है। विज्ञान के विस्फोट तथा भाषा के अंतःस्फुट के साथ-साथ जहां एक ओर तकनीकी प्रगति शिखर की तरफ बढ़ रही है, वहीं सामाजिक और सांस्कृतिक संकट की तीव्रता भी महसूस की जा रही है। आज लेखक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इतिहास के अंत और विचारधारा के अंत के बवंडर में इतिहास को या समाज की भूमिका को कैसे रचनात्मक रूप दे। यही नहीं रचनात्मकता के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वह भाषा संबंधी, ज्ञान मीमांसा संबंधी दैनंदिन आचरण को कैसे रूपायित करे। ‘ क्रमशः ‘ कहानी संग्रह की लेखिका ने इस उहापोह में जो कौशल अपनाया है, वह ‘ नई कहानी ‘ के शिल्प का अतिक्रमण नहीं कर पाया है। लेकिन नई कहानी आंदोलन से इस मायने में भिन्न है कि इसमें संवेदनशीलता का, अनुभूति की तीव्रता का जो रचाव है, वह नई कहानी की रोमानी भावुकता से अछूता है। उदाहरण के लिए इन कहानियों में राजेंद्र यादव की कहानियों जैसा लिजलिजापन नहीं है और न तो निर्मल वर्मा जैसा अतीत के प्रति आत्म समर्पण है। यद्यपि ये कहानियां रोजमर्रा के आचरण, विचार तथा...

क्यों आत्महत्या करते हैं सुरक्षा कर्मी !

आलोक वर्मा     भारतीय जीवन दर्शन में आत्महत्या को जिंदगी से पलायन माना गया है। शायद यही कारण है कि आत्महत्या के मामले अक्सर सहानुभूति का कारण नहीं बनते। युवाओं की अकाल मौत कभी-कभी अनजान लोगों को भी द्रवित कर देती है। जिंदगी से संघर्ष करते-करते कोई चला जाए तो सहज ही उसके लिए दुख होता है। लेकिन आत्महत्या करने वाले को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। माल्ट्स बर्गर के अनुसार- ‘ यह पता लगाना चाहिए कि कोई व्यक्ति किस लिए जीता है। अधिकांश व्यक्ति सभी तरह की बातों के   लिए जीते हैं। यदि जीवन में उन्हें कोई एक चीज नहीं मिल पाती तो वे कोई और वस्तु ले लेते हैं। किंतु आत्महत्या की प्रवृत्ति वाले मनुष्यों में अपने आंतरिक साधनों के बल पर दुनिया में रहने की क्षमता नहीं होती। ‘ आत्महत्या कायरता है, जीवन से, जिम्मेदारियों से पलायन है। यह जानते हुए भी आत्मघात की प्रवृत्ति बढ़ी है और न सिर्फ किसानों, मजदूरों और अशिक्षितों में बढ़ी है बल्कि पढ़े लिखे वर्ग और मुश्किलों और कठिनाइयों के झंझावातों का सामना करने वाले जवानों में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। पिछले दिनों दिल्ली में राष्ट...

यादों के झरोखों में ‘सब जग जलता देखिया’

आलोक वर्मा संस्मरण के दायरे में क्या आना चाहिए ? आखिर संस्मरण लिखा जाए तो उनमें किन बातों का उल्लेख किया जाना चाहिए ? क्या संस्मरण के नाम पर सिर्फ कीचड़ उछालने का काम किया जाना चाहिए ? क्या सिर्फ पुराना हिसाब चुकता करने के लिए संस्मरण लिखा जाना चाहिए ? क्या उसमें तत्कालीन विसंगतियों, चुनौतियों, संघर्षों तथा उनका मुकाबला करने वालों के योगदान को नकार कर सिर्फ अपनी यशोगाथा दूसरे की निंदा ही संस्मरण लिखने का मूल उद्देश्य होना चाहिए ? डा. शुकदेव सिंह के संस्मरण की पुस्तक ‘ सब जग जलता देखिया ’ को पढ़ते समय ये कुछ प्रश्न सहज मन में उठते हैं। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पहलू को अगर नजरअंदाज भी कर दें तो कम से कम साहित्यिक दुनिया और वातावरण का खाका तो खींचा ही जाना चाहिए ताकि अगली पीढ़ी को भूतकाल से वर्तमान का आंकलन करन में सहूलियत हो।   वैसे सच तो यह है कि अगर हम राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक वातावरण का विवेचन नहीं करेंगे तो साहित्य के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे। फिर उसका हश्र वही होगा जो शुकदेव सिंह की पुस्तक ’ सब जग जलता देखिया ’ का हुआ है। वह पुस्तक एक पक्षीय बयानबाजी भर...

सामाजिक यथार्थ की प्रतिनिधि कहानियां

आलोक वर्मा शेखर जोशी ‘ नई कहानी ’ के कथाकारों में से एक हैं। शायद वे अकेले कहानीकार हैं, जिसने नई कहानी के दौर में लिखना शुरू किया और आज भी उसी सक्रियता के साथ रचनारत हैं, जबकि अमरकांत जैसे एकाध कहानीकारों को छोड़ दिया जाए तो उस दौर के अधिकांश कथाकार पिछले कई सालों से ‘ न लिखने के कारण ‘ पर मनन कर रहे हैं। शेखर जोशी की पहली कहानी ‘ दाज्यू ‘ 1953-54 में छपी थी और अपनी पहली क हानी से वे चर्चित हो गए थे। अमूमन उनकी प्रकाशित सभी कहानियां चर्चा के केंद्र में रहती हैं। शेखर जोशी चूंकि नई कहानी आंदोलन की देन हैं, इसलिए उनकी कहानियों में उस दौर की प्रवृत्तियों का पाया जाना लाजिमी है। लेकिन किसी खास दौर की प्रवृत्ति में बंधकर वे नहीं रहे। उन्होंने समय की रफ्तार के साथ बदलते जीवन को देखा, परखा और जीवन की उसी संवेदना को, समाज को, समाज की उसी विडंबना को कहानियों के माध्यम से विश्लेषित किया। इस बारीक पकड़ ने ही उन्हें सदैव शीर्षस्थ कहानीकार बनाए रखा। अपने रचनाकर्म के बारे में शेखर जोशी ने लिखा है- ‘ छोटी उम्र में मातृविहीन हो जाने के बाद पर्वतीय अंचल के प्राकृतिक सौंदर्य से वनस्पतिव...

साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण का विकल्पः ‘काल-बोध’

आलोक वर्मा संप्रति यूरोपीय महादेशों में समाज वैज्ञानिक एक गंभीर बहस में उलझे हुए हैं। यह बहस ‘ मास सोसायटी ’ और ‘ मास कल्चर ’ के नाम से चलाई जा रही है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि पूंजीवादी उत्पादन के कारण समाज अराजकता की चपेट में कसता जा रहा है। इस अराजकता से शून्य की स्थिति पैदा हो रही है। आज दुनिया इतनी छोटी होती जा रही है कि इस समस्या की उपेक्षा हम भी नहीं कर सकते। विज्ञापन और बाजार के माध्यम से पूंजीवादी ‘ पब्लिक ओपीनियन ’ पैदा कर समूचे राष्ट्र में गृह युद्ध की संभावना तैयार कर रहे हैं। अर्थात देश-विदेश में जो तनाव और द्वंद्व चल रहा है, उस क्रांतिकारी परिस्थिति को कैसे प्रतिक्रांतिकारिता में परिवर्तित कर दिया जाए। इसके साथ सूचना साम्राज्यवाद की भी अवतारणा कर दी गई   है। इसके माध्यम से वस्तुओं के साथ – साथ मनुष्य के ज्ञान चेतना, जीवन मूल्य तथा आशा आकांक्षा पर आधिपत्य स्थापित किया जा रहा है। हमारे संस्कृति जगत के सभी कार्यकर्ताओं का ध्यान उधर क्यों नहीं पहुंच पा रहा है ? कुछ लोग अवश्य साहित्य और संस्कृति के ऊपर साम्राज्यवादी अभियान से विचलित हो उठे हैं। वे इस...