आलोक वर्मा
सच यह है कि लाखों बच्चे देह व्यापार में लगे हैं। इतने सालों से बाल श्रम की समस्या निरंतर जारी है। उसके कार्यान्वयन के लिए अभियान भी चलाए जाते हैं लेकिन वास्तव में योजना सिरे नहीं चढ़ पाती। कानून बनते हैं लेकिन उनका पालन कराने में कोई सरकार सफल नहीं हुई। यह अनंत कथा जैसी हो चुकी है। बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सरकारी दावे जोर-शोर से किए जाते हैं लेकिन उनका परिणाम कैसा होता है सभी को पता है। कुपोषण के मामले में बच्चे अव्वल है। हां, कभी-कभी जब कोई मामला मीडिया में उछलता है तो लोगों का ध्यान जाता है और दो एक दिन की खबरों के बाद यथास्थिति बन जाती है।
बच्चों को शिक्षित करने के लिए सरकार दावे दर दावे किए जा रही है। पैसे खर्च किए जा रहे हैं तथा आंकड़ों से कागजों के पेट भरे जा रहे हैं, लेकिन सच तो गांवों में जाकर ही पता चलता है। जहां स्कूल जाने की उम्र में बच्चे मां-बाप के साथ मिलकर पेट पालने के क्रम में लगे हुए हैं क्योंकि जब पेट भरेगा तभी कुछ हो सकेगा। सरकार ने छोटे बच्चों को स्कूल जाने के प्रति आकर्षित करने के लिए दोपहर के खाने की योजना बनाई लकिन वह कितनी सिरे चढ़ी है यह बताने के लिए कोई तैयार नहीं है।कुछ साल पहले बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए उनके मां बाप को बच्चों द्वारा अर्जित की जाने वाली मजदूरी के बराबर धन भुगतान की योजना बनायी गयी थी लेकिन वह योजना सिरे नहीं चढ़ पायी।
अब हालात और भी बुरे हो गये हैं। निठारी जैसे कांड सामने आ रहे हैं जो बच्चों की दयनीय दशा को उघाड़ रहे हैं। निठारी तो केवल एक बानगी है, पुलिस की हृदयहीनता से न जाने कितने मासूम धरती से उठ गए होंगे और कुछ मामले पुलिस की फाइलों में दबकर रह गए होंगे।
संयुक्त राष्ट्र के हवाले से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा वर्ष 2004 में जारी किये गये आंकड़े बच्चों को लेकर हमारे शासक वर्ग और पुलिस की हृदयहीनता की कहानी कहते हैं। अगर उन पर गौर किया जाए तो बच्चों के मामले में स्थिति बहुत भयावह है। भारत में हर साल 45 हजार बच्चे गायब हो जाते हैं। इनमें से 4200 बच्चे घरों में काम करने वाले होते हैं। हर वर्ष 15 लाख बच्चे देह व्यापार में शामिल किए जा रहे हैं। एक लाख से ज्यादा बच्चों का इस्तेमाल अश्लील साहित्य और सीडी बनाने में हो रहा है। रोजाना सैकड़ों बच्चे अपराध के शिकार हो रहे हैं। वैसे तो हर वर्ग के बच्चे हिंसा के शिकार हो रहे हैं लेकिन ज्यादातर बच्चे गरीब और अशिक्षित परिवारों के होते हैं।
बाल कल्याण के लिए काम कर रही संस्था प्रयास के कार्यकारी निदेशक राजीव हलदार बताते हैं कि उनकी संस्था के ' चाइल्ड हेल्पलाइन' रोजाना 10 से ज्यादा बच्चों के फोन आते हैं। हर माह 60-70 बच्चे मदद की गुहार लगाते हैं। इस दिशा में काम करने वाले एक एनजीओ का कहना है कि इसमें से केवल 10 फीसदी बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज होती है। इस मामले में पुलिस रिसर्च एंड डवलपमेंट की निदेशक किरण बेदी कहती है कि बच्चों के खोने की रिपोर्ट पुलिस थानों की अपेक्षा चाइल्ड हेल्पलाइन में ज्यादा होती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जो रिपोर्ट जारी की है उसके मुताबिक ज्यादातर लापता बच्चे झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, बिहार और उड़ीसा में लापता होते हैं। बच्चों के अवैध व्यापार के लिए गरीब लोगों को चुना जाता है। संयुक्त राष्ट्र की ड्रग और क्राइम आफिस के पीएम नायर, जिन्होंने मानवाधिकार पर कार्य किया, उनका कहना है कि ज्यादातर लापता बच्चों की खोज नहीं हो पाती क्योंकि पुलिस उनकी तलाश नहीं करती और मीडिया भी उनके बारे में लिखने और दिखाने में आगे नहीं आता।
नोएडा कांड खुलने के बाद धीरे-धीरे जो बातें उभर कर सामने आ रही हैं वे संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को सही साबित कर रही हैं। नोएडा से पिछले दिसंबर माह में 11 बच्चे लापता हुए । एक माह पूर्व तक यह आंकड़ा 150 था जो बढ़कर 161 हो गया। निठारी गांव और आसपास से 50 से अधिक बच्चे लापता हो गये और पुलिस ने उनकी तलाश करने की कोशिश नहीं की, ऊपर से रिपोर्ट लिखाने गए बच्चों को भद्दी-भद्दी गालियां देकर थानों से भगा दिया गया। जहां पुलिस को मामला खोलना चाहिए था, वह सोयी रही या अपना क्राइम रिकार्ड बेहतर दिखाने अथवा अपराधी से मिलीभगत कर उसे बचाने के उद्देश्य से कोई कार्रवाई नहीं की। पूरा पुलिस तंत्र ही नकारा साबित हो गया। यह केवल नोएडा या निठारी का मामला नहीं है बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश का यही हाल है। मुरादाबाद जिले के सभी थानाध्यक्षों से गुमशुदा बच्चों की तलाश करने का आदेश दिया गया है। इसी तरह कानपुर शहर की स्थिति बड़ी भयावह है जहां पिछले पांच सालों में 132 बच्चे लापता हो गये और पुलिस प्रशासन कुछ नहीं कर पाया। रिपोर्ट में तो यहां तक कहा गया है कि अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक बच्चों के खोने का आंकड़ा कई सौ में हैं, लेकिन पुलिस ने ज्यादातर मामलों को दर्ज ही नहीं किया। दुखद तो यह है कि वहां के पुलिस अधीक्षक की देखरेख में बच्चों का खोया पाया प्रकोष्ठ चलता है लेकिन उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।
स्थिति भयावह है तभी तो हाईकोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को लापता बच्चों की जानकारी मुहैया कराने का निर्देश दिया। अगर जांच के दायरे को देश स्तर पर ले जाएं तो तकरीबन सभी राज्यों का यही हाल है। हरियाणा के अंबाला जिले से पिछले एक साल में 18 बच्चे लापता हुए हैं। इसी तरह राजस्थान के श्रीगंगानगर में वर्ष 2006 के दौरान 140 लोग लापता हुए जिनमें 29 लड़के और 19 लड़कियां थीं। मुंबई के भिवंडी से 60 बच्चों के लापता होने का पता चला है।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक वर्ष 2005 में भारत के बच्चों के खिलाफ 14975 अपराध की घटनाएं हुईं। 2004 में बच्चों के खिलाफ 14423, अपराधिक घटनाएं हुईं थीं। 2004 की तुलना में 2005 में बच्चों के खिलाफ अपराध में 3.8 फीसदी की वृद्धि हुई। 2005 में 1327 बच्चों की हत्या हुई। यह आधिकारिक आंकड़ा है जबकि गैर आधिकारिक आंकड़ा इससे अधिक हो सकता है। 2004 में बाल हत्या के 1304 मामले दर्ज हुए । 2005 में 2004 की तुलना में बाल हत्या में 1.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। बाल हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर है। देश में कुल बाल हत्याओं में उत्तर प्रदेश की भागीदारी 29.4 प्रतिशत रही।
उत्तर प्रदेश में 2004 में 390 बाल हत्यायें दर्ज हुईं। इसी तरह 2005 में बच्चों के साथ बलात्कार के 4026 मामले दर्ज हुए। 2004 में ऐसी 3542 घटनाएं हुईं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक बाल बलात्कार की संख्या में 13.7 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी। मध्य प्रदेश इस मामले में पहले स्थान पर रहा। वहां ऐसी 870 घटनाएं दर्ज हुईं, वहीं महाराष्ट्र दूसर नंबर पर रहा, वहां 634 मामले दर्ज किए गए। दिल्ली भी बाल अपराध के मामले में पीछे नहीं है। ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2005 में दिल्ली में बाल अपहरण के 301 मामले दर्ज कराये गये। 2003 में देश में बाल अपरहण के 2571 मामले दर्ज कराये गए, वहीं 2005 में ऐसे 3518 मामले दर्ज किए गये। मनोविश्लेषक अरुणा ब्रूटा कहती हैं कि शहरों में बच्चों के यौन शोषण की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
निठारी कांड के बाद राजनीतिक पार्टियां, समाजसेवी संगठन तथा न्यायिक तंत्र सक्रिय हुआ है। केंद्र सरकार बच्चों को शोषण से बचाने के लिए शीघ्र ही एक कानून बनाने पर विचार कर रहा है। यह कानून बच्चों को यौन शोषण, घरेलू हिंसा, उनकी तस्करी, स्कूलों में दी जाने वाली भयंकर सजा से बचाएगा। इसका नाम ' आफेंस अगेंस्ट चिल्ड्रेन एक्ट - 2007' रखा गया है।
इसी के साथ सरकार ने राष्ट्रीय बाल आयोग गठित करने का भी फैसला किया है जो इसी माह (जनवरी 2007) के अंत तक अस्तित्व में आ जाएगा, जिसमें बच्चों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएंगे। इसके साथ ही महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने ' इंटिग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम ' (आईसीपीएस) का विस्तार करने का फैसला किया है। महिला एवं बाल कल्याण विभाग की मंत्री रेणुका चौधरी ने कहा कि इन योजनाओं के अलावा 11वीं पंचवर्षीय योजना में बच्चों के रखरखाव और सुरक्षा के मद्देनजर राशि की वृद्धि की जाएगी। इसके अलावा उड़ीसा सरकार ने भी मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की अध्यक्षता में एक मंत्रिमंडलीय समिति का गठन किया है जो बाल श्रम से जुड़ी समस्याओं के विस्तृत अध्ययन के अलावा उनके पुनर्वास से संबंधित विभिन्न पक्षों की समीक्षा करेगी।
रिपोर्ट के मुताबिक मुख्य रूप से ऐसे बच्चों के पुनर्वास के मामलों को पहली वरीयता दे रही है क्योंकि उसकी चिंता बच्चों का पुनर्वास है। उड़ीसा सरकार का अनुमान है कि राज्य में लगभग 2 लाख 15 हजार श्रमिक हैं। दूसरी तरफ गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि राज्य में ऐसे बच्चों की संख्या 40 लाख से अधिक है। केंद्र और उड़ीसा सरकार के इस कदम से आशा की जा सकती है, लेकिन क्योंकि बच्चों से जुड़े अधिकांश मामलों में असली कार्रवाई पुलिस को करनी होती है और उसका अब तक का रवैया सकारात्मक नहीं रहा है। वह हमेशा मामले को दबाने में ज्यादा सक्रिय नजर आती है ताकि उसकी वर्दी पर दाग न लगे। इसके अलावा जो पार्टी सत्ता में रहेगी वह पुलिस का बचाव करेगी जैसे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का नेतृत्व कर रहा है। मुख्यमंत्री के भाई और राज्य सरकार में प्रमुख मंत्री शिवपाल यादव तो राज्य की पुलिस की पीठ थपथपा गये और यहां तक कह गये कि ' इस तरह के छोटे मोटे मामले तो हुआ ही करते हैं।' जब शासकों का रवैया ऐसा होगा तो पुलिस की भूमिका कैसी रहेगी? सच कहें तो निठारी कांड ने अपराध, पुलिस प्रशासन और राजनीति की चिंदियां बिखेर दी हैं।
क्या न्यायपालिका और कार्यपालिका मिलकर इस पर विचार करेंगे। इसे केवल किसी एक राज्य का मामला मानकर नहीं चलना चाहिए बल्कि एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए तैयार होने वाली पौध को कैसे सींचा जाए ताकि वह फल फूल सके न कि नष्ट हो जाए। कोई ऐसा कठोर कदम उठाना चाहिए ताकि आगे से कोई दूसरा कांड न हो।
(14 जनवरी 2007 को दैनिक ट्रिब्यून के रविवारीय अंक में प्रकाशित)
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