कथाकार अवध नारायण सिंह की सष्ठिपूर्ति के मौके पर वर्ष 1992 में यह इंटरव्यू लिया गया था। इसके कुछ साल बाद अवध नारायण जी अपने गांव रवेली जिला वाराणसी (वर्तमान में संत कबीर नगर( भदोही) चले गए और अब वहीं रह रहे हैं। यह साक्षात्कार कलकत्ता के दैनिक छपते-छपते में 28 जनवरी 1992 को प्रकाशित हुआ था।
आलोक वर्मा/नरेंद्र प्रसाद सिंह
प्रश्नः आपके बचपन और ग्रामीण जीवन के संबंध में हम लोग जानना चाहते हैं।
अवध नारायण सिंह- मेरा जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। ऐसी परिस्थिति में जैसे दूसरे किसान बच्चों का पालन -पोषण , शिक्षा दीक्षा होती है ठीक वैसी ही बात मेरे साथ हुई। बचपन की कोई उल्लेखनीय घटना नहीं है जिसके बारे में कहा जाए। हां, तब का ग्रामीण जीवन बहुत सादा एवं सामान्य था। सामंती रुचि के तहत तब का ग्रामीण जीवन चलता था। मुझे ऐसा लगता है कि उसे समय सौ पचास वर्षों में भी कोई खास परिवर्तन नहीं होता था। बहुत कुछ स्थिर समाज ही कहा जा सकता है। आजादी के बाद जो मूल्यगत परिवर्तन जीवन में हुए हैं वे उस समय के समाज में नहीं थे। लोगों में सहज आत्मीयता थी। प्रेम था और आपसी कलह भी होती थी तो किसी बड़े मूल्य को लेकर। यानी चोरी होती थी डाका नहीं पड़ता था। खून खराबा भी होता था तो उसके पीछे कोई बड़ा कारण होता था।
प्रश्न- आप लेखन के क्षेत्र में कैसे आये और कहानी विधा ही क्यों चुना?
अवध नारायण सिंह- मुझे स्वयं ही नहीं मालूम है कि मैं लेखन में कैसे आ गया, क्योंकि कोई ऐसा परिवेश नहीं था। एक मेरे मित्र हैं श्रपति त्रिपाठी जिनका संबंध कम्युनिस्ट पार्टी से था, उनके प्रभाव में आकर मैं राजनीति से जुड़ा। वे मुझे पार्टी लिटरेचर तथा अन्य साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। इस प्रकार सन् ' 51 में मेरी पहली रचना (कहानी नहीं) बनारस में आज में प्रकाशित और पुरस्कृत हुई थी। मैं गांव में रहते हुए कहानियां लिखने लगा था। दरअसल कहानी लेखन का प्रारम्भ विधिवत कलकत्ता आने के बाद ही शुरू हुआ। कहानी विधा अपनाने का कारण शायद यह रहा है कि मैं अपने अनुभवों को ज्यादा सही तौर पर इसी विधा में व्यक्त कर सकता हूं।
सवाल- आपके 'एक बिंदु अनेक कोण' से राजनीति का कैसा संबंध है?
अवध नारायण सिंह- 'एक बिंदु अनेक कोण' मेरा पहला कहानी संग्रह है जो 1960 में प्रकाशित हुआ। दूसरा संग्रह ' कहानियां ' है। इन दोनों की भावभूमि और विषय वस्तु आंचलिक है। इसे यों कहा जा सकता है कि ये कहानियां छठे दशक की मानसिकता से जुड़ी हुई हैं। उस समय मैं सक्रिय राजनीति से जुड़ा था इसलिए इन कहानियों पर राजनीतिक प्रभाव अधिक है।
प्रश्न- आप सन् '60 के बाद की कहानियों के प्रमुख हस्ताक्षर हैं और 'आत्मीय' की कथावस्तु और शिल्प पहले संग्रह से एकदम अलग है। यह परिवर्तन क्यों आया और कितना उचित था?
अवध नारायण सिंह- सन् '60 के बाद न केवल भारत में बल्कि विश्व पटल पर भी गुणात्मक परिवर्तन दिखायी पड़ता है। शहर में आने के बाद मेरा संबंध महानगरीय बोध से हुआ। आत्मीय, पाढ़ा, रफू, अन्टी कमरा, तीन घंटे आदि कहानियां पहले की कहानियों से विषयवस्तु और शिल्प दोनों की दृष्टि से भिन्न हैं। कुछ लोगों का आरोप यह भी है कि आत्मीय संग्रह की कहानियां अस्तित्ववाद के प्रभाव के अंतर्गत लिखी गई हैं। मैं मानता हूं कि मेरी कहानियों में सामाजिक चेतना कभी लुप्त नहीं हुई। व्यक्ति के माध्यम से समाज को देखने की कोशिश की गई है समाज के माध्यम से व्यक्ति को नहीं।
प्रश्न- आप घोषित रूप से मार्क्सवादी थे और मार्क्सवादी आंदोलन से आपका संबंध था यानी आप स्वाधीनता (सीपीएम बंगाल का हिंदी साप्ताहिक) के संपादन से संबद्ध थे तो फिर राजनीति विरोधी रुख आपकी कहानियों में क्यों आया?
अवध नारायण सिंह- मैंने कभी भी राजनीति का विरोध न जीवन में किया न साहित्य में। अगर नारा ही राजनीति है तो वह राजनीति के मंच से आये तो बेहतर है। साहित्य में यह एक विचारधारा, दृष्टिकोण और संवेदना से जुड़कर ही सार्थक होती है।
प्रश्न- अकहानी आंदोलन तो सीधे सीधे मार्क्सवाद विरोधी कहा जाता है ?
अवध नारायण सिंह- अकहानी को मार्क्सवाद विरोधी कहना तर्कसंगत नहीं है। अकहानी कहानी के उस रूप का विरोध करती थी जो समस्याओं के बजाय कथा रस में ही डूबे रहते थे। अकहानी ने कहानी के सपाटबयानी का विरोध किया था। उस समय व्यापक स्तर पर कोई व्यापक राजनीतिक आंदोलन नहीं था। पार्टी विभाजन से मुझे धक्का लगा और मैंने सदस्यता छोड़ दी। फिर भी राजनीति को परिवर्तन का सबल माध्यम मानता हूं।
प्रश्न- इधर की कहानियों (दावेदार) में कहानियों का वस्तुवादी पक्ष बहुत प्रबल है। क्या आप अपने पहले के लेखन को नकारते हैं या यह उसकी अगली कड़ी है?
अवध नारायण सिंह- 'दावेदार' संग्रह की कहानियां गांव एवं शहर के जीवन से जुड़ी हैं। 'आत्मीय' की कहानियां
सामा़जिकता से जुड़कर भी कुछ विच्छिन्न थीं। जनवादी आंदोलन के बाद कहानी में कहानीपन की वापसी की बात उठाई गयी इसलिए इस संग्रह की कहानियां अधिक वस्तुवादी प्रतीत होती हैं।जैसे प्रेमचंद के सोजेवतन और 'कफन' तथा 'पूस की रात' जैसी कहानियों में बड़ा फर्क है, वैसे ही मेरी आंचलिक तथा नगर जीवन की कहानियों में फर्क है। मैं अपने 'आत्मीय' संग्रह और 'दावेदार' संग्रह की कहानियों को विकास ही मानता हूं। नगरीय और ग्रामीण जीवन में जो फर्क है वही इन संग्रहों की कहानियों में फर्क है। मेरा समूचा लेखन वस्तुवादी ही रहा है भाववादी नहीं।
प्रश्न- लघु साहित्यिक पत्रिका आंदोलन से आपका गहरा संबंध है। आप किन पत्रिकाओं से संबद्ध रहे और उनकी क्या उपलब्धियां रहीं
अवध नारायण सिंह- मेरा लेखन कुछ को छोड़कर लघु साहित्यिक पत्रिकाओं के माध्यम से ही प्रकाश में आया। मैं स्वयं लघु पत्रिका आंदोलन से जुड़ा रहा हूं। 'परिवेश', 'संदर्भ', 'परिदृश्य', 'संचयन', 'सामयिक'. 'संवाद', 'सामयिक परिदृश्य', 'रूपलेखा', 'गल्प भारती' आदि पत्रिकाओं से मेरा किसी न किसी तरह से संबंध रहा है। यह कहना असंगत न होगा कि मेरा समूचा साहित्य लघु पत्रिकाओं के माध्यम से ही हुआ। जितने सशक्त लेखक आज साहित्य में सक्रिय हैं उन सभी का संबंध
लघु पत्रिकाओं से रहा है।
प्रश्न- किन-किन विशिष्ठ साहित्यकारों से आपका गहरा संबंध रहा है? जिन लोगों ने आपको महत्व नहीं दिया जैसे मार्कण्डेय, नामवर सिंह आदि। उसके पीछे क्या कारण हैं बताएंगे?
अवध नारायण सिंह- मेरा संबंध अनेक विशिष्ट साहित्यकारों से रहा है जैसे रामविलास शर्मा, डा. नामवर सिंह, अमृत राय, भैरव प्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय, भगवान सिंह , दूधनाथ सिंह, निर्मल वर्मा और कई लोग। किसी साहित्यकार को कई कारणों से महत्व दिया भी जाता है और नहीं भी दिया जाता है। साहित्य में अन्तर्संबंधों का संबंध बहुत काम करता है। इस काम में शायद सफल नहीं रहा। मार्कण्डेय चाहे हों या नामवर सिंह हों किसी को उछाल तो जरूर सकते हैं परन्तु बड़ा लेखक नहीं बना सकते। अगर इन्होंने घास नहीं डाली तो मुझे चिन्ता भी नहीं है।
प्रश्न- आपने जो उपन्यास लिखा है वे आपकी कहानियों से अलग नहीं। क्या अपनी कहानियों से अलग हटकर उपन्यास लिखने की आपकी कोई योजना है?
अवध नारायण सिंह- कहानी या उपन्यास को हम कथा विधा मानते हैं। उपन्यासों में कई कहानियां जुड़ भी जाती हैं। ऐसा मेरे साथ ही नहीं, बड़े लेखक प्रेमचंद के साथ भी देखा जा सकता है। मैं इन दिनों एक उपन्यास लिख रहा हूं जो सर्वथा एक अलग भावभूमि पर आधारित है। शायद इसमें मैं उस दोष से मुक्त हो पाऊंगा।
प्रश्न- आप श्मशानी पीढ़ी में क्यों गए और उससे अलग क्यों हो गए? यह प्रतिक्रिया बस था या दोस्तों का दबाव था?
अवध नारायण सिंह-श्मशानी पीढ़ी हिंदी में जब चल रही थी तब बंगला में भूखी पीढ़ी, तेलुगु में दिगम्बरी पीढ़ी, अमेरिका में वीटनिक पीढ़ी आदि साहित्यिक आंदोलन देश विदेश में हो रहे थे। यह एक प्रकार का उछाल था आवेग था। जो स्थिर जल में पत्थर फेंकने जैसा था। हलचल पैदा करने तथा जड़ता तोड़ने के साथ ही मुखौटा उतारने के लिए। ऐसे आंदोलन टिकाऊ होते नहीं हैं, प्रतिक्रिया पैदा करके काल कवलित हो जाते हैं। कभी कभी कुसंग का असर भी होता है। दोस्तों में गलत सही किया भी जाता है।
श्मशानी पीढ़ी की कहानी एक लम्बी कहानी है। इस पीढ़ी का जन्म श्मशान में मुर्दे को अध्यक्ष बनाकर हुआ था। मुझे प्रधान अतिथि बनाया गया था जबकि मैं अनुपस्थित था। बाद में मित्रों के आग्रह पर मैं इससे जुड़ा। लेकिन मेरी जो भी रचनायें श्मशानी पीढ़ी की पत्रिका विभक्ति में छपीं वे अन्य रचनाकारों से भिन्न थीं। उनमें मेरा भावबोध बदला नहीं था।
प्रश्न- ऐसा कहा जाता है कि कलकत्ता में लेखन नहीं के बराबर हो रहा है। इस बारे में आपके क्या विचार हैं ?
अवध नारायण सिंह- लेखन के केंद्र बदलते रहते हैं। प्रारम्भ में कलकत्ता हिंदी पत्रकारिता और साहित्य का गढ़ था। बाद में वाराणसी, फिर इलाहाबाद और अब दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली है इसलिए लाभ, लोभ, सुविधा, व्यापार सब खींचकर उसकी गोद में समा रहे हैं तो कला और साहित्य के क्षेत्र में भी दिल्ली अगर अगुवाई कर रही है, तो आश्चर्य नहीं है। कलकत्ता एक गैर हिंदी भाषा-भाषी नगर है, यहां भी लोग हिंदी प्रदेशों से आते हैं, उऩका मुख्य उद्देश्य जीविकोपार्जन होता है। उनमें से कुछ लोग लेखन के क्षेत्र में भी आ जाते हैं। यह कहना सही नहीं है कि कलकत्ता में लेखन नहीं के बराबर हो रहा है। इसके प्रकाश में न आने के अनेक कारण हैं । कलकत्ता में न तो हिंदी के साहित्यिक प्रकाशक हैं और न ही नियमित उच्चकोटि की साहित्यिक पत्रिका। इसलिए यहां का लेखन सुव्यवस्थित और सुनियोजित ढंग से प्रकाश में नहीं आ पा रहा है। लेखक स्वयं अपने प्रभाव से पुस्तक निकालते हैं, पत्रिकाएं निकालते हैं। गोष्ठियां करते हैं और मंच के अभाव में केंद्र तक नहीं पहुंच पाते हैं।
प्रश्न- लेखकों का राजसत्ता से कैसा संबंध होना चाहिए।
अवध नारायण सिंह- लेखकों का राजसत्ता से जुड़ना घातक होता है। साहित्य का वीरगाथा काल और रीतिकाल इसका उदाहरण है। हां, अगर कोई सत्ता प्रगतिशील है, जनहित में काम कर रही है तो लेखक को उसका समर्थन करना चाहिए लेकिन आंख मूंदकर नहीं। लेखक को राजसत्ता के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए समर्पणवादी दृष्टि नहीं। लेकिन जो लोग राजसत्ता से लाभ लेते हैं वे तो राजसत्ता के चारण होंगे ही।
प्रश्न- कलकत्ता में किस किस विधा में कौन कौन से लेखक हैं।
अवध नारायण सिंह- मेरे पहले से जो लेखक इस शहर में लिख रहे हैं उनमें आचार्य कल्याण मल लोढ़ा, विष्णुकांत शास्त्री, हर्षनाथ, छेदीलाल गुप्त, सन्हैयालाल ओझा, मनमोहन ठाकौर आदि प्रमुख हैं।
कहानी लेखन में, इसराइल, मार्कण्डेय सिंह, अनय, सिद्धेश, सुकीर्ति गुप्ता, स्व. कृष्णा पटेल, स्व. अपर्णा टैगोर, रामवृक्ष चंद, केदार सारथी, विमलेश्वर एवं स्व. मोहन प्रमुख हैं। कविता के क्षेत्र में छविनाथ मिश्र, डा. चंद्रदेव सिंह, सकलदीप सिंह, श्रीहर्ष, अक्षय उपाध्याय, आलोक शर्मा, उपल, पंचदेव, ध्रुवदेव मिश्र पाषाण, नीलम श्रीवास्तव, रामवृक्ष चंद, बुद्धिनाथ मिश्र, राजनंदन मिश्र, रीता मेहरोत्रा, कुसुम जैन, प्रफुल्ल कोलाख्यान, नूर मोहम्मद नूर, मुरारी लाल शर्मा प्रशांत, आलोक वर्मा, नरेंद्र प्रसाद सिंह, महेश जायसवाल, राम सिंह, रमेश अग्रहरि और अभिज्ञात जैसे कवि हैं तो उपन्यासकारों में सन्हैया लाल ओझा, हर्षनाथ, छेदीलाल गुप्त, इसराइल, डा प्रभा खेतान, सिद्धेश आदि प्रमुख हैं।
आलोचना के क्षेत्र में सकलदीप सिंह, विमल वर्मा, परशुराम, स्व. अलख नारायण, श्री निवास शर्मा, डा शंभुनाथ, अरुण माहेश्वरी जैसे आलोचक हैं तथा ललित निबंध के क्षेत्र में डा. कृष्ण बिहारी मिश्र का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। समकालीन समस्याओं पर गीतेश शर्मा ने भी कई पुस्तकें लिखी हैं।
प्रश्न- आज की राजनीतिक उथल-पुथल में क्या मार्क्सवाद अप्रासंगिक हो गया है?
अवध नारायण सिंह- पूर्वी यूरोप तथा सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने से विश्वभर के मार्क्सवादी भौंचक्के और चिंतित हैं। किन्तु समाजवादी व्यवस्था टूटने से मार्क्सवाद अप्रासंगिक नहीं हो सकता। आज भी मार्क्सवाद दुनिया का सबसे पवित्र दर्शन है, हां हमें इस संदर्भ में बड़ी गंभीरता से सोचने की जरूरत है। जब तक समाज में शोषण, उत्पीड़न, गैरबराबरी कायम है, मार्क्सवाद कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकता।
प्रश्न- आप जनवादी लेखक संघ (जलेस) के पदाधिकारी हैं। संगठन की उपलब्धियों के बारे में कुछ बताएंगे। लोगों का कहना है कि यह केवल कागजी संगठन है।
अवध नारायण सिंह- मैं जलेस पश्चिम बंगाल का उपाध्यक्ष और कलकत्ता जिला का अध्यक्ष हूं। यह संगठन जिस उत्साह और जोश-खरोश से बना था और लेखकों को आकर्षित किया था अपनी निष्क्रियता के कारण विशेष रूप से रेखांकित नहीं किया जा सकता। आज के युग में संगठन आवश्यक है लेकिन संगठन अगर कागजी ही रहे तो सार्थकता खो बैठता है। जनवादी लेखक संघ की निष्क्रियता का कारण स्वयं मैं भी हूं। इसे कागजी कहना अन्याय होगा। आज हिंदी साहित्य में अगर कहीं कोई काम हो रहा है वह केवल जलेस ही कर रहा है।
प्रश्न- आपके साहित्य से आपकी जीविका का कोई संबंध है क्या?
अवध नारायण सिंह- कोई संबंध नहीं है, बल्कि जीविका के लिए घातक ही है। अगर लेखन न कर ट्यूशन करता तो बैंक बैलेंस होता। जीविका कमाने का समय ज्यादातर साहित्य रचने, साहित्यिक गोष्ठियों में हिस्सेदारी में ही बीत जाता है।
प्रश्न - साहित्य साधना के प्रति आपके परिवार का क्या रुख है?
अवध नारायण सिंह- मेरी साहित्यिक साधना के प्रति पहले परिवार विपक्ष में था। क्योंकि हम निम्न मध्य वर्ग में पैदा हुए जहां लोगों के लिए साहित्य लिखना समय बर्बाद करना माना जाता है। इस समय परिवार मेरी इस साधना के प्रति तटस्थ ही है। कहीं सम्मान या पुरस्कार मिलता है तो खुश ही होते हैं।
प्रश्न- आपको एक पुरस्कार मिला है वह जिस प्रतिष्ठान से संबद्ध है वह आपके वर्ग का विरोधी है। उससे पुरस्कार लेते समय आपको कैसा लगा ?
अवध नारायण सिंह- मदम मोहन अग्रवाल स्मृति सम्मान मुझे मिला। मैं इस उपचार ट्रस्ट प्रतिष्ठान को सम्मान की दृष्टि से देखता हूं क्योंकि इस ट्रस्ट के द्वारा अनेक सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक क्रियाकलाप हो रहे हैं। हम लोग हर बात को वर्ग समर्थक और वर्ग विरोधी मान लेते हैं। नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, डा. राम बिलास शर्मा, डा. नामवर सिंह को कई सरकारी और गैर सरकारी सम्मान और पुरस्कार मिले। अगर माने तो जिन सरकारों ने यह पुरस्कार दिए थे वे भी वर्ग विरोधी ही हैं।
प्रश्न- आपके लेखन और सम्पादन की अगली योजनाएं क्या-क्या हैं?
अवध नारायण सिंह- इन दिनों मैं एक उपन्यास पर काम कर रहा हूं। सम्पादक के रूप में सोचता हूं कि सामयिक परिदृश्य को नियमित बनायें और इसका स्तर और अधिक ऊंचा उठे। अलग से सम्पादन की कोई योजना नहीं है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें