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वामपंथी सोच की लक्ष्मण रेखा



नोटः इस समय माकपा की दो दिन की पार्टी कांग्रेस हैदराबाद में शुरू हुई है जिसमें पार्टी की बेहतरी और विस्तार को लेकर आगे की रणनीतियों पर विचार किया जाएगा। पार्टी ने पहले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के हाथों सत्ता गंवाई और फिर अभी कुछ माह पहले त्रिपुरा में भाजपा के हाथों हार गई। सरकार में होने के बावजूद केरल की स्थिति भी इस समय बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। वैसे तो राजनीति में हार जीत लगी रहती है। लेकिन माकपा के बारे में ऐसा नहीं कह सकते। यह पार्टी अपनी भूलों से सबक सीखने के लिए तैयार नहीं दिख रही। इस पार्टी द्वारा ऐतिहासिक भूल करने का रिकार्ड बनता जा रहा है। इसके कुछ नेता जिनका कोई जनाधार नहीं है वे शीर्ष पर विराजमान हैं। उऩके हठ और बेतुके फैसलों के चलते पार्टी का जनाधार लगातार सिकुड़ता जा रहा है। एकला चलो की नीति के कारण पश्चिम बंगाल में तो उनके कार्यकर्ताओं के जान के लाले पड़ गये हैं। लेकिन एयर कंडीशंड कमरों में बैठकर फैसले लेने वाले आपसी हिसाब किताब बराबर करने में लगे हुए हैं जिसका खामियाजा कार्यकर्ताओं को भुगतना पड़ रहा है।
नीचे मैं अपना एक लेख दे रहा हूं। यह लेख 2004 में लिखा गया था, जब कांग्रेस चाहती थी कि दोनों वामपंथी दल (माकपा और भाकपा) केंद्र सरकार में शामिल होकर सरकार चलाने में सहयोग करें। यही इच्छा ज्योति बसु और हरिकिशन सिंह सुरजीत की भी थी। लेकिन उस समय माकपा की केंद्रीय समिति ने कुछ वोटों के बहुमत से उस फैसले को नकार दिया था। पहले ज्योति बसु को इसी गुट ने प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था।
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आलोक वर्मा


क्या वामपंथी दलों ने केंद्रीय सत्ता प्रतिष्ठान में भागीदारी नहीं करने का फैसला लेकर एक बार फिर गलती की है? आजादी के बाद 2004 के लोकसभा चुनावों में मिली अपनी इस ऐतिहासिक जीत का फायदा उठाने में क्या वामपंथी दल (खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) चूक गए हैं। वुद्धिजीवियों, मशहूर हस्तियों तथा वाम समर्थकों की अपीलों को दरकिनार करते हुए माकपा ने केंद्रीय सरकार में शामिल न होने का फैसला किया। पार्टी की केंद्रीय कमेटी की बैठक के पहले पार्टी के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत तथा पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने केंद्र की प्रगतिशील गठबंधन सरकार में शामिल होने की आशा जताई थी। लेकिन पार्टी की दो दिन तक  चली बैठक में इस संभावना को खारिज कर दिया गया। माकपा केंद्रीय कमेटी की  बैठक के बाद जो बयान जारी किया गया उसमें पार्टी का मानना है कि वह लोकसभा चुनाव के नतीजे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,  भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीयता वाले सांप्रदायिक गठबंधन और उसके धनाढ्य बड़े व्यापरिक घरानों के समर्थन की आर्थिक तथा अमेरिका के वर्चस्ववादी मंसूबों के सामने घुटने टेकने की उसकी विदेश नीति के खिलाफ जनादेश है। माकपा ने भाजपानीत गठबंधन की लोकप्रियता में कमी आने के लिए किसानों, ग्रामीण आबादी तथा आम जनता को नुकसान पहुंचाने वाली अंधाधुंध उदारीकरण की उसकी नीति को जिम्मेदार ठहराया है। उसने भरोसा जताया है कि नयी सरकार सत्ता प्रतिष्ठान शिक्षा, अनुसंधान तथा सांस्कृतिक निकायों में सांप्रदायिक घुसपैठ खत्म करेगी, आम जनता को राहत देने, रोजगार के अवसर बढ़ाने, कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों को प्राथमिकता देने, शिक्षा, स्वास्थ्य़, अनुसूचित जाति – जनजाति एवं महिला कल्याण में निवेश बढ़ाने तथा मुनाफे वाले सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण नहीं करने की आर्थिक नीति अपनाएगी।
लेकिन क्या सरकार से बाहर रहने पर उनकी ये मांगें, सलाहें मान ली जाएंगी और अगर नहीं तो क्या उसका केंद्र सरकार में शामिल न होने का फैसला गलत नहीं होगा? क्या केरल, पश्चिम बंगाल और केरल में अपने जनाधार को बचाने के लिए फैसला लिया गया है? माना जाता है कि उन पर इन राज्यों में अपना आधार-सरकार  बचाए रखने का दबाव हमेशा रहता है इसलिए वे ऐसा कदम उठाते हैं। क्या यही दबाव इस बार भी काम कर गया?
सवाल था कि अगर केंद्र की सत्ता में भागीदारी कर लेंगे तो किस मुद्दे को लेकर चुनाव लड़ते तथा अपने विपक्षी दल का विरोध कैसे करते। केंद्र के हर सही गलत फैसले के लिए ये दल भी जिम्मेदार होंगे। लेकिन अगर यह बात सही है तो क्या बाहर से समर्थन देकर सरकार चलवाने पर केंद्र के सभी फैसलों के लिए ये जिम्मेदार नहीं होंगे। जनता तो इनसे फिर भी जवाब मांगेगी। केंद्रीय मंत्रिमंडल में भागीदारी के चलते वे सरकार के फैसलों पर नियंत्रण रख सकते थे और अपनी नीतियों के अनुकूल फैसले करवा सकते थे।
वामपंथी दलों खासकर माकपा पर यह आरोप लगता रहा है कि केरल और पश्चिम बंगाल के उसके कई नेता कोई ऐसा खतरा मोल लेना नहीं चाहते जिससे उनकी सुख सुविधाओं और हैसियत पर आंच आए, क्योंकि माकपा की केंद्रीय कमेटी और पोलित ब्यूरो में अधिकांश नेता पश्चिम बंगाल और केरल से ही आते हैं। 1996 में जब ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बबने का अवसर आया था तो माकपा केंद्रीय कमेटी ने दो दिन चली लंबी बहस के बाद इस प्रस्ताव को नकार दिया था। ज्योति बसु और सुरजीत की इच्छाओं के विपरीत यह प्रस्ताव एक या दो वोटों से रद्द हो गया था। तब जो स्थिति सामने आयी थी उसमें कहा गया था कि ज्योति बसु के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनेगी तो उसमें वामपंथियों का बहुमत न होने के कारण नीतिगत फैसलों में समझौता करना पड़ेगा। ऐसे में जब अपनी नीतियां लागू न कर पायें तो सरकार चलाने का क्या फायदा। केंद्रीय कमेटी के इस फैसले से खिन्न ज्योति बसु ने बाद में उसे ऐतिहासिक भूल करार दिया था। जिसे बाद में पार्टी ने भी स्वीकार कर लिया था।
माकपा को लेकर एक दिलचस्प आरोप यह लगता रहा है कि उसने बड़ी पार्टी होने के बावजूद हिंदी भाषी राज्यों में पैठ बनाने की कोशिश नहीं की। इसे लेकर पार्टी ने कभी संतोषजनक जवाब भी नहीं दिया। एक समय माकपा और भाकपा का हिंदी भाषी राज्यों में ठीक ठाक जनाधार रहा था। लेकिन समुचित ध्यान न देने के कारण उनका स्थायी जनाधार नहीं बन पाया। दोनों दल उत्तर प्रदेश और बिहार में सपा और राजद का पिछलग्गू बनकर रह गये। चुनाव आता है तो इन दोनों दलों के मुखिया रोटी के टुकड़े के समान एकाध सीटें कम्युनिस्ट पार्टियों को थमा देते हैं और इसे लेकर दोनों दलों के नेता संतुष्ट हो जाते हैं। उपेक्षा के चलते ही उत्तर प्रदेश में माकपा के वोटर और माकपा के वोटर समर्थक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में चले गये हैं। उत्तर प्रदेश में अगर वामपंथियों का असर होता तो वहां सपा और बसपा की जातिवादी राजनीति पर अंकुश लगता ही, साथ ही भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति का नुकसान भी नहीं उठाना पड़ता। अगर दोनों वामपंथी दल केंद्रीय सत्ता में भागीदार होते तो उसके फायदे कार्यकर्ताओं को  मिलते और लोग भी पार्टियों से जुड़ते तथा उनका जनाधार बढ़ता। लेकिन इनके नेता इस ओर ध्यान नहीं देना चाहते।
आखिर ऐसा कौन सा कारण है कि जब वामपंथी दलों को केंद्र की सत्ता में भागीदारी का अवसर मिलता है तो वे नकार देते हैं। यह सही है कि जब तक वे पूर्ण बहुमत में नहीं आएंगे तब तक अपनी नीतियां पूरी तौर पर लागू नहीं करा सकते। लेकिन मंत्रिमंडल में शामिल होने पर यह तो फायदा मिलेगा ही कि वे अपनी बात रख सकें और अपने मन मुताबिक फैसले करवा सकें। उनके सरकार में रहने पर आम जनता की मांगे वहां प्रतिनिधित्व पातीं और बड़े उद्योग घरानों के मनमानेपन पर भी अंकुश रहता।
लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि इन पार्टियों के बड़े नेता जानबूझ कर ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते। कहीं यह भय तो नहीं है कि हिंदी भाषी प्रांतों में अगर पार्टी का विस्तार हुआ तो उनके नेतृत्व को चुनौती मिल सकती है। क्योंकि अगर केंद्र सरकार में वाम दल भागीदारी करते हैं तो खासकर हिंदी भाषी राज्यों में उनके पांव पसारने के ज्यादा मौके रहेंगे। साथ ही उनके तीन राज्यों की पार्टी होने का धब्बा मिट जाएगा। लेकिन यह पार्टियां तीन राज्यों से आगे बढने का कोई संकेत देती नजर नहीं आतीं।
अब माकपा और उसके चलते भाकपा ने केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन देने का फैसला लिया है। क्या वे न्यूनतम साझा कार्यक्रम लागू कराकर केंद्र से अपनी अपेक्षाएं पूरी करा सकेंगे? क्या उनके समर्थकों में अच्छा संदेश जाएगा?

(यह लेख दैनिक ट्रिब्यून में 22 मई 2004 को प्रकाशित हुआ था)

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